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________________ शंका और उसका समाधान ५३ सहकारी कारणका यह अर्थ करता है कि यह दूसरे द्रव्यको क्रियाको सहायक रूपमें करता तो उसे अपने इस सदोष विचारके संशोधनके लिए समयसार गाथा ८५-८६ पर दृष्टिपात करना चाहिए और यदि वह उसका कालप्रत्यासत्तिवश यदनन्तरं यद्भवति' इतना ही अर्थ करता है तो इसमे हमें कोई आपत्ति नहीं। ऐसा अर्थ करना आगमसम्मत है । 'जीवहि हेदुभूदे' इत्यादि गाथा में आया हुआ 'उवयारमरोण' पद 'असद्भूतव्यवहार' इस अर्थका सूचक है जैसा कि हम आलापपद्धतिका उद्धरण उपस्थित कर पूर्व में ही सूचित कर आये हैं। पर द्रव्य अन्य द्रव्यके कार्यका वास्तविक निमित्त नहीं और न वह कार्य उसका नैमितिक है । यह व्यवहार है जो असद्भूत है। यही बात 'उवयारमत्तेन' इस पद द्वारा सूचित की गई है । तत्वार्थश्लोकातिक १० १५१ के उद्धरणका जो अभिप्राय है इसका खुलासा हमने पूर्वमें ही किया है। उससे अधिक उसका दूसरा आशय नहीं है । मीमांसादर्शन शब्दको सर्वथा नित्य मानकर सहकारी कारणसे ध्वनिकी प्रसिद्धि मानता है और फिर भी वह कहता है कि इससे शब्द अधिकृत रूपसे नित्य हो बना रहता है। अष्टशती (अष्टसहस्री पृ० १०५) का 'तदसामथ्र्यंम खण्डयत्' इत्यादि वचन इसी प्रसंग में आया है। इस द्वारा भट्टाकलंकदेवने मीमांसा दर्शन पर दोषका आपादान किया है. इस द्वारा जैनदर्शनके सिद्धान्सका उद्घाटन किया गया है ऐसा यदि अपर पक्ष समझता है तो उसे हम उम पक्षको भ्रमपूर्ण स्थिति हो मानेंगे। हमें इसका दुःख है कि उसकी ओरसे अपने पक्ष के समर्थन में ऐसे वचनोंका भी उपयोग किया गया है। सर्वथा नित्यवादी मीमांसक यदि शब्दको सर्वथा नित्य मानता रहे, फिर भी वह उसमें ध्वनि आदि कार्यकी प्रसिद्धि सहकारी कारणोंसे माने और ऐसा होनेपर भी वह शब्दों में विकृतिको स्वीकार न करे तो उसके लिए यही दोष तो दिया जायगा कि सहकारी कारणोंने उसकी सामर्थ्यका यदि खण्डन नहीं किया है तो उन्होंने ध्वनि कार्य किया, यह कैसे कहा जा सकता है, वे तो अर्कचित्कर ही बने रहे। स्पष्ट है कि इस बचनसे अपर पक्षके अभिप्रायकी अणुमात्र भी पुष्टि नहीं होती । अपर पक्षने अष्टशती के उक्त वचनमें आये हुए 'तत्' पदका अर्थ उपादान जानबूझ कर किया है । as fh उसका अर्थ 'सर्वथा नित्य शब्द' है । यह सूचना हमने बुद्धिपूर्वक की है और इस अभिप्रायस की है कि जैनदर्शन में उपादानका अर्थ नित्यानित्य वस्तु लिया गया है। किन्तु मीमांसादर्शन शब्दको ऐसा स्वीकार नहीं करता । अपर पक्षने रामयसार गाथा १०५ की आत्मख्याति टीकाको उपस्थित कर जो अपने विचारकी पुष्टि करनी चाही हैं वह ठीक नहीं हैं, क्योंकि उक्त टीका के अन्त मे आये हुए 'स तूपचार एव न तु परमार्थः ' इस पदका अर्थ है— 'वह विकल्प तो उपचार ही है अर्थात् उपचरित अर्थको विषय करनेवाला ही है, परमार्थरूप नहीं है अर्थात् यथार्थ अर्थको विषय करनेवाला नहीं है।' किन्तु इसे बदलकर अपर पक्ष से इस वाक्पका यह अर्थ किया है— 'आत्मा द्वारा पुद्गलका कर्मरूप किया जाना यह उपचार हो है अर्थात् निमित्तनैमित्तिक भावको अपेक्षा से ही है परमार्थरूप नहीं हूं अर्थात् उपादानोपादेय भावको अपेक्षा से नहीं है । हमें आश्चर्य है कि अपर पक्ष ने उक्त वाक्यके प्रारम्भमें आये हुए 'सः' पदका अर्थ 'विकल्प' न करके 'आत्मा द्वारा पुद्गलका कर्मरूप किया जाना यह अर्थ कैसे कर लिया। अपर पक्षको यह स्मरण रखना चाहिए कि निमित्त व्यवहार और नैमित्तिक व्यवहार उपचरित होता है और यह तब बनता है जब परने परके कार्यको किया ऐसे विकल्पकी उत्पत्ति होती है । यही तथ्य उक्त गाया और उसकी टीका द्वारा प्रकट किया गया है।
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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