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________________ ५० जयपुर (खानिया) तत्त्वचर्चा और उसकी समीक्षा किया गया है या निक्षेप व्यवस्था अनुसार जो नाम, स्थापना और द्रव्य निक्षेपका विषय है उसे भी विषय करता है। अश्रवा नैगमनयके स्वरूप द्वारा असदभूत व्यवहारलयको समझा जा सकता है। जिस पर्यायका संकल्प है वह वर्तमानमें अनिष्पन्न हूँ फिर भी उसके आलम्बनसे संकल्पमात्र को ग्रहण करने वाले नयको नंगमनय कहा है। इसी प्रकार असद्भुतम्यवहारनय इष्टार्थका ज्ञान कराने में समर्थ है, इसीलिए उसे सम्यक नयोंमें परिमणित किया है। भेद द्वारा वस्तुको ग्रहण करना जहाँ सद्भूत व्यवहारनप कहा गया है वहां उसकी विवक्षाभेदसे निश्चयनय संज्ञा भी आगममें प्रतिपादित की गई है। किन्तु निमित्तनैमित्तिक सम्बन्धको (दो द्रव्योंमें) बतलानेवाला व्यवहारनय असदभूत व्यवहारनय ही है, वह किसी भी अवस्थामें निश्चय संज्ञाको प्राप्त करनेका अधिकारी नहीं, अतएव व्यवहार कहकर भेदव्यवहार और निमित्त नैमित्तिक व्यवहार इन दोनों को एक कोटिमें रखकर प्रतिपादन करना उचित नहीं है । ज्ञेय स्वरूपसे ज्ञेय और ज्ञायक स्वरूपसे ज्ञामक है। यह आरोपित धर्म नहीं है, असः इनका सम्बन्ध कहना भले ही व्यवहार (उपचार) होओ, इसमें बाधा नहीं, परन्तु है ये दोनों धर्म अपने-अपन में सद्भूत ही, असद्भूत नहीं । किन्तु ऐसी बात निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्धके विषय में नहीं है । कुम्भकार स्वरूपसे चटका निमित्त नहीं है और न ही घट (मिट्टी) स्वरूपसे कुम्भरकारका कर्म (नैमित्तिक) ही है। फिर भी अन्यके का अन्यरे मोट करते मिट्टी का कुम्भकारमें और कुम्भकारके कर्म धर्मका घटमें आरोंप करके कुम्भकारको घटका कर्ता और घटको कुम्भकारका कर्म कहना असद्भूत ब्यवहार ही है। यदि यह सद्भुत व्यवहार होता तो विवक्षाभेदसे निश्चय संशाको भी प्राप्त होता। किन्तु यह व्यवहार असद्भुत ही है, अतएव यह विवक्षाभेदमे निश्चय संशाको प्राप्त करनेका भी अधिकारी नहीं और इस अपेक्षासे अपर पक्ष द्वारा दिया गया नेत्रका उदाहरण प्रकृसमें अक्षरशः लागू पड़ता है। नेत्र रूपको ही जानता है, रसको नहीं। फिर भी उसे रसको जाननेवाला कहा जायगा तो वह असद्भूत व्यवहार ही ठहरेगा। उसी प्रकार कुम्भकार अपने योग और विकल्पका ही कर्ता है, चटका नहीं, फिर भी उसे घटका कर्ता कहा जायगा तो यह असद्भूत व्यवहार ही ठहरेगा, क्योंकि निदचपसे जैसे नेत्र रसको जाननेमें असमर्थ है उसी प्रकार कुम्भकार भी निश्चयसे वट की क्रिया करने में सर्वथा असमर्थ है। इस प्रकार नयोंका प्रसंग उपस्थित कर अपर पक्षने जो हमारे "दो व्योंकी विवक्षित पर्यायोंमें निमित्त-नैमितिक सम्बन्ध व्यवहारनयसे ई, निश्चयनयसे नहीं।' इस कथन पर टीका की है वह कैसे आगम विरुद्ध है इसका विचार किया । ७. कता-कर्म आदिका विचार आगे अपर पक्षने कर्ता-कर्म भाव और निमित्त-नैमित्तिक भावकी घरचा उपस्थित कर अपने उन विचारोंको यहां भी दुहरा दिया है जिनकी विशेष चरचा शंका ५ के तीसरे दौर में की है। इसी प्रसंगमें अपर पक्षने लिखा है 'इस तरह हमारे आपके मध्य मतभेद केवल इतना ही रह जाता है कि जहाँ हमारा पक्ष आत्मामें उत्पन्न होनेवाले रागादि विकार और चतुर्गतिभ्रमणरूप कार्यको उत्पत्तिमें द्रव्यकमके उदयरूप निमित्त कारण
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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