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________________ शंका १ और उसका समाधान (अ) सर्व कार्यों का सर्वथा कोई नियत काल हो ऐसा एकान्त नियम नहीं है, क्योंकि प्रवचनसारमें घी अमृतचन्द्र आचार्यने कालनय और अकालनप, नियतिनय और अनियतिनय इन गयोंकी अपेक्षा कार्यको सिद्धि बतलाई है और ऐसा प्रत्यक्ष भी देखा जाता है, और किसीने कोई काप नियत भी नहीं किया है । अतः आगे पीछे न करनेका प्रश्न ही नहीं उठता। (आ) कर्मस्थितिबंधके समय निषेक रचना होकर यह निवत हो जाता है कि अमुन कर्म वर्गणा अमुक समय उदयमें आदेगी, किन्तु बन्धावलिके पश्चात् उत्कर्षण, अपकर्षण, स्थितिकांडकवात, उदीरणा, अविपाकमिर्जरा आदि द्वारा कर्मवर्गणा आगे पीछे भी उदयमें आती हैं जिसको कर्भशास्त्र के विशेषज्ञ भलीभांति जानते है । किन्तु इतना नियत है कि कोई भी कर्म स्वभुख या परमखरूपगं अपना फल दिये बिना अकर्मभावको प्राप्त नहीं होता । (जयधवल पु० ३ १०२४५) । इस विषयका विशेष विषेचन प्रश्न नं. ५ के पत्रक में किया जावेगा तथा आगे भी यथा अवसर कूछ लिखा जावेगा। ___ आपने लिखा है कि-'दो द्रव्योंकी विवक्षित पर्यायोंमें निमित्त-मैमित्तिकराम्बन्ध व्यवहारनयसे है, निश्चयनमसे नहीं ।' सर्वत्र स्थान र पर इसीर और दिया गया है। 'न्यवहारनय के पूर्व 'मात्र' शब्द लगाकर या उसका अर्थ 'उपचार' करके यह भी दर्शाया गया है कि अवहारसे जो कथन है यह वस्तुतः वास्तविक नहीं है। यदि नयोंके स्वरूप तथा विषयगर ध्यान दिया जाय तो स्पष्ट हो जाता है कि निमित्त-नैमित्तिक सम्बन्धका कथन निश्चयनयसे होनेका प्रसंग ही जान्न नहीं हो सकता है । जो विषय जिस नयका है उसका कथन उस ही नपसे किया जा सकता है, अन्य नयसे नहीं। यदि उस ही विषयको अन्य नयका विषय बना दिया जायगा तो मर्व विष्टव हो जायमा और नय विभाजन अर्थात् नय अयवस्था भी समीचीन नहीं रह सकेगी। जैसे प्रत्येक द्रव्य व्यवहार नयकी अपेक्षारो अनित्य है। यदि निश्चयनय की अपेक्षासे भी द्रव्यको अनित्य कहा जायगा तो व्यवहारनय तथा निश्चयनयम कोई अन्तर ही न रहेगा । दोनों एक ही हो जायेंगे । द्रव्यको नित्य बतलाने वाला कोई नय ही न रहेगा। इस प्रकार द्रव्यके दूसरे धर्मका कथन नहीं हो सकनेके कारण वस्तु स्वरूपका ज्ञान एकांगी (मर्वथा एकान्तरूप) एवं मिथ्या हो जायगा । अर्थात द्रव्य एकान्ततः (सर्वथा) अनित्य हो जायगा और इस प्रकार पूर्ण क्षणिकवाद आ जायगा । अतः अनित्यताका कथन ध्यपहारनयसे ही हो सकता है. निश्चयनयसे नहीं हो सकता है । निश्चयनय तो व्यवहारनय के विषयको प्रण करने में अंघ-पुरुष के समान है। किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यवहारनयका विषय होनसे अनित्यता प्रामाणिक, वास्तविक या सत्य नहीं है। अनित्यता भी उतनी ही प्रामाणिक, वास्तविक व सत्य है जितनी निस्यला। • यदि व्यवहारनयके विषयको प्रामाणिक नहीं माना जायगा तो व्यवहार नय मिथ्या हो जायगा, किन्तु आगममें प्रत्येक नय प्रामाणिक माना गया है। जो परनिरपेक्ष कुनय होता है उसीको मिथ्या माना गया है, सम्यक् नयको भिया नहीं माना गया है । • एक द्रव्यवे. खण्ड या दो द्रब्योंका सम्बन्ध व्यवहारनवका विषय है । अत: दो द्रव्योंका सम्बन्ध होनेके कारण निमित्त नैमितिक सम्बन्धका कथन' व्यवहारनवसे ही हो सकता है, निश्तयनयसे नहीं । जैसे पर प्रन्यों के साथ जो ज्ञेष-ज्ञायकसम्बन्ध है उमका कथन व्यवहारनयसे ही हो सकता है, निश्चयनयरो नहीं। चूंकि यहाँ भी दो द्रव्योंका सम्बन्ध है। जैसे वर्णको ऑस्त्र ही बतला सकती है, नाक आदि अन्य इन्द्रियाँ नहों ।
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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