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________________ जयपुर खानिया) तरचर्चा और उसकी समीक्षा अथा बलीबर्दपरिभ्रमणापादितारगर्तभ्रान्ति घटीयन्त्रान्तिजनिक बलीवदंपरिभ्रमणाभावे चारगर्तभ्रान्त्यभावाद् घटीयन्त्रभ्रान्तिनिवृत्ति च प्रत्यक्षत उपलभ्य सामान्यतो दृष्टादनुमानाद बलीवदंतुल्यकर्मोदयापादितां चतुर्गत्यरगर्तभ्रान्ति शारीर-मानसबिविधवेदनाघटीयन्त्रभ्रान्तिनिका प्रत्यक्षत उपलभ्य ज्ञानदर्शनचारित्राग्निनिर्दग्धस्य कर्मण उदयाभावे चतुर्गस्यरगर्तभ्रान्त्यभावात् संसारघटीयन्त्रभ्रान्तिनिवृत्त्या भवितव्यमित्यनुमीयते यासी संसारघटीयन्त्रभ्रान्तिनिवृत्तिः स एव मोक्ष इति । अर्थात्-जैसे घटीयंत्र (रेहट) का धूमना उसके घुरेके घूमनसे होता है और धुरेका घूमना उसमें जुते हुए बलके घूमने पर । यदि बलका घूमना बन्द हो जाय तो धुरेका घूमना रुक जाता है और धुरेके रुक जाने पर घटीयन्त्रका घू मना बन्द हो जाता है । उसी तरह कर्मोदयरूपी बैलके चलनेपर ही चार गतिरूपी धुरेका चक्र चलता है और चतुर्गतिरूपी घुरा ही अनेक प्रकारको पारीरिक मानसिक आदि वेदनारूपी घटी-यन्त्रको. घुमाता रहता है । कर्मोदयको निवृत्ति होने पर चतुर्ग तिका चक्र रुक जाता है और उसके स्कनेसे संसाररूपी घटीयंत्रका परिचलन समाप्त हो जाता है. इसीका नाम मोक्ष है। इसी सम्बन्धमै निम्न प्रमाण भी द्रष्टव्य है प्रेर्यते कर्म जीवेन जीवः प्रर्यत कर्मणा । एतयोः प्रेरको नान्यो नौमाविकसमानयोः ।।१०६||-उपासकाध्ययन १० २९ अर्थ-जीव कर्मको प्रेरित करता है और कर्म जीवको प्रेरित करता है। इन दोनोंका सम्बन्ध नौका और नाविकके समान है, कोई तीसरा इन दोनोंका प्रेरक नहीं है ॥१०६।। ५ क्लेशाय कारणं कर्म विशुद्धे स्वयमात्मनि । गोष्णमम्बु स्वत: किन्तु तदीय ह्निसंश्रयम् ॥२४७॥-उपासकाध्ययन पृ० १२० अर्थ-आत्मा स्वयं विशुद्ध है और कर्म उसके क्लेशका कारण है। जैसे जल स्वयं गरम नहीं होता, आगफे सम्बन्धसे उसमें गर्मी आ जाती है ॥२४७।।। उत्पाद्य मोहमदविह्वलमेव विश्व वेधाः स्वयं गतगाठकवद्यथेष्टम् ! संसारभीकरमहागहनान्तराले हन्ता निवारयितुमत्र हि का समर्थः ।।७७॥-आत्मानुशासन अर्थ-कर्मरूपी ब्रह्मा समस्त विश्वको ही मोहरूपी मदिरा मुर्शित करके तत्पश्चात् स्वयं ही ठगके समान निर्दय बनकर इच्छानुसार संसाररूपी भयानक महायनों मध्यमें उसका घात करता है। उससे रक्षा करनेके लिए भला दुसरा कौन समर्थ है ? अर्थात् कोई नहीं ।।७७।। आपने स्वयं भी प्रश्न नं. ५ के उत्तर में कर्मको बलवत्ता स्वीकार करते हुए माना है कि सुख दुःख भरण आदि सब कर्मोदयके अनुसार होता है। किन्तु इस प्रश्न के उत्तर में आप उसको स्वीकार नहीं कर रहे हैं यह आश्चर्यकी बात है। यह हमारे प्रश्नका आगम सम्मत उत्तर है। प्रश्नका उत्तर न देकर आपने जो अप्रासंगिक विवेचन एकान्त नियतिवाद तथा नोकर्म आदि निमित्तों के विषयमें कर दिया है अब उस पर भी विचार किया जाता है आपने लिखा है कि-'प्रेरक कारणसे किसी द्रव्य में कार्य आगे पीछे कभी भी किया जा सकता है, सो यह सिद्ध करना संगत न होगा। आपका ऐसा लिखना उचित नहीं है ।
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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