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________________ १३४ जयपुर (खानिया) तत्त्वचर्चा और उसकी समीक्षा आपके उस पत्रकपर हमने प्रवचनसार, पञ्चास्तिकाय, परमात्मप्रकाश और द्रव्यसंग्रह ग्रन्थोंके अनेक प्रमाण देकर यह सिद्ध किया था कि व्यवहारघम (व्यवहार रत्नत्रय) साधन है और निश्चयधर्म (निश्चय रत्नत्रय) साध्य है। परमत्रमाणभूत, मूलसंवके प्रतिष्ठापक श्रीकुन्दकुन्दाचार्य तथा अन्य आध्यात्मिक प्रामाणिक आचार्योक आर्ष प्रमाण देखकर जिनवाणीका थडालु तत्स्यवेत्ता नतमस्तक होकर उन्हें स्वीकार कर लेखा है, ऐगी हो आशा आपये भी थी: किन्तु आपने उन प्रमाणोंको स्वीकार नहीं किया और असद्भत व्यवहारनयको आर लेकर उन मालनिया है ना दि. मामान मामाल भाटापनापकी अपेक्षासे महीं है और न उसकी अपेक्षासे हो ही सकता है। इसके लिये आलापपद्धति के अन्तमें दिया हुआ अध्यात्म नयोंका प्रकरण द्रष्टव्य है । वहाँ सद्भूत तथा असद्भूत न्यबहारनयका निम्न प्रकार लक्षण दिया है। व्यवहारो भेदविषयः, एकवस्तुविषयः सद्भूतव्यवहारः, भिन्नवस्तुविषयोऽसद्भूतव्यवहारः । अर्थ-त्र्यवहारनय भेष विषयवाला है। एक ही वस्तु जिसका विषय है वह सद्भूतव्यवहारनय है और भिन्न वस्तु जिसका विषय है वह अराद्भूतत्र्यवहारनय है । इस विवेचनसे आरपाका व्यवहार रत्नत्रय है यह सद्भूतव्यवहार नयका विषय ठहरता है। अपनी पक्षपुष्टिके लिये आपने कोई भी ऐसा आगम प्रमाण उपस्थित नहीं किया जो व्यवहार धर्मको निश्चयधर्मका साधन न मानता हो। हमारे प्रश्न १२ के उत्तरमै आपने स्पष्टरूपसे स्वीकार कर लिया है कि 'कुगुरु कुधर्म कुशास्त्रकी श्रद्धा गृहीत मिथ्यात्व है तथा सुदेव सुशास्त्र सुगुरुको श्रद्धा सम्यग्दर्शन है ।' इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए श्री नियमसारमें निम्न गाथा दी है . अत्तागमतच्चाणं सद्दहणादो हवेइ सम्मत्तं ॥५॥ अर्थ-आप्त, आगम और तत्त्वोंकी श्रद्धासे सम्यत्रत्व होता है । उसकी टीकामें स्पष्टीकरण करते हुए लिखा हैव्यवहारसम्यक्त्वाख्यानमेतत् । यह व्यवहार सम्यक्त्यके स्वरूपका कथन है । 'सम्यग्दृष्टिके ऐसी श्रद्धा अवश्य होती है और वह ऐसे कथनको शास्त्रोक्त मानता है आपका यह उत्तर ठीक है, अतः हमने इसे स्वीकार कर लिया है । परन्तु आपने हमारे चौथे प्रश्न के उत्तरमें जो लिखा है वह आपके इस उक्त १२ वें प्रश्नके उत्तरसे विरुद्ध है। आपने इस चौथे प्रश्नके उत्तरमें लिखा है कि व्यवहार धर्मरूप रागपरिणामको व्यवहार मोक्षमार्ग आगममें कहा है तथा यह भी कहा है कि 'वह (रागपरिणाम सहचर होनेसे निश्चय मोक्षमार्गके अनकल है। आपका राग परिणामको निश्चय मोक्षमार्गके अनफल लिखना उचित नहीं है। राग परिणाम तो निश्चय मोक्षमार्गके अनुकूल नहीं हो सकता। अतः आपका यह लिखना आगम सम्मत नहीं है, क्योंकि किसी भी आगम ग्रन्थमें मात्र राग परिणामको व्यवहार मोक्षमार्ग नहीं कहा है। यद्यपि व्यवहार मोक्षमार्ग अर्थात् व्यवहार रत्नत्रयके साथ प्रशस्त रागभाव रहता है, परन्तु मोक्षमार्ग मात्र रायभावको नहीं बतलाया गया है। सर्वत्र सम्पग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक चारित्रको रत्नत्रय या मोक्षमार्ग कहा है 1 जैसा कि निम्न प्रमाणोंसे स्पष्ट सिद्ध होता है
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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