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________________ १२४ जयपुर (खानिया) तत्त्वचर्चा और उसकी समीक्षा जीयका शुभ परिणाम और तन्निमित्तक पुद्गलोंका कर्मपरिणाम पुण्य है । तथा जीवका अशुभपरिजाम और तन्निमित्तक पुद्गलोंका कर्मपरिणाम पाप है। अपर पक्षने सम्यग्दृष्टिके शुभभावोंको वीतरागता और मोक्ष प्राप्तिका हेतु कहा है और उसको पुष्टिमें प्रश्चनसार आदि ग्रन्थों का नामोल्लेख भी किया है। साथ ही यह भी लिखा है कि 'सम्यग्दष्टिका शुभभाष कर्मचेतना न होकर ज्ञानचेतना माना गया है। किन्तु यह सब कथनमात्र है, क्योंकि आगममें न तो कहीं शुभभावोंको वीतरागता और मोक्षप्राप्तिका निश्चय हेतु बतलाया है और न कर्मचेतनाका अन्तर्भाव ज्ञानचेतनामें ही किया है। इन दोनोंके लक्षण ही आगममें जदे-जदे प्ररूपित किये गये हैं। समयसार गाथा ३० आदिकी टीका कर्मचेतनाका लक्षण करते हुए लिखा है तत्र ज्ञानादन्यत्रेदमहे करोमीति चेतनं कर्मचेतना। उसमें, ज्ञानसे भिन्न अन्य भायों में ऐसा चेतना कि 'मैं इसको करता हूँ ।' कम चेतना है। इससे स्पष्ट है कि शुभ भावोंका ज्ञानचेतनामे कयमपि अन्तर्भाव नहीं हो सकता । दया शब्द सरागभाव और वीतरागभाष दोनोंके अर्थमें आगममें प्रयुक्त हुआ है, जैसा कि अपरपक्ष द्वारा उपस्थित किये गये आगमप्रमाणोंसे भी विदित होता है, मात्र इसी अभिप्रायसे हमने 'यदि प्रवृतमें दयासे वीतराम परिणाम स्वीकार किया जाता है' इत्यादि कसन अपने दूसरे उत्तरमें किया था। इस आधारसे अपर पक्षने जो अभिप्राय व्यक्त किया है वह प्रधानतासे स्वयं उस पक्षको ही ध्यान देने योग्य है, हमारा तो उस ओर ध्यान सदासे रहा है और इसीलिए हम शुस परिणति और शुभपरिणतिको मिलाकर एक नहीं लिख या कह रहे है। अपर पक्षको भी इन दोनों के वास्तविक भेदको स्वीकार कर लेना चाहिए । समग्र आगममें सुमेल बिठलानेका एकमात्र यही मार्ग है। जान आत्माका प्रधान गुण है. उस द्वारा अखण्ड आत्माका कथन हुआ है, इसलिए मोक्षप्राभूतके साथ संगति बैठ जाती है। समयसार कलश १०६, १०७ में इसी अर्थ में 'ज्ञान' शब्द आया है । अन्यत्र भी ऐसा ही समझना चाहिए । इसका विशेष खुलासा आचार्य अमृतचन्द्रने समयसारके परिशिष्ट में किया ही है। उस पर दृष्टिपात कीजिए। मोक्षप्राभृत गाथा ६० में जो तपश्चरण करनेकी प्रेरणा की है वह इच्छानिरोधरूप तपश्चरण करने के लिए ही कहा गया है । 'इच्छानिरोधस्तपः' यह प्रसिद्ध आगम वचन है 'चारित्र भी 'स्वरूपस्थिति' का दूसरा नाम है-'स्वरूपे चरणं चारित्रम् ।' प्रबचनसार गाथा ७, आचार्य अमतचन्द्रकृत टीका । बाह्य तप या चारित्रको जो तप या चारित्र मंज्ञा प्राप्त है वह निश्चमतप और निश्चय चारित्रका सहचर होनेसे ही प्राप्त है। आचार्यने मोक्षप्राभूत गा. ६० में ऐसे ही तपश्चरण करनेकी प्रेरणा की है। मुनिदीक्षा स्वरूपस्थितिका दूसरा नाम है । वह न हो और बाह्य तय करनेका विकल्प और क्रियाकाण्ड मात्र हो तो वह न सच्ची मुनिदीशा है और न सच्चा तपश्चरण ही है। अपर पक्षने आगे सूत्रप्राभूत, मोक्षप्राभृत तथा तत्त्वायत्र-तत्त्वार्थवातिकके जो प्रमाण दिये है वे पूर्वोक्त अभिप्रायकी ही पुष्टि करते है। तभी तो तत्त्वार्थवातिकमें चारित्रका यह लक्षण किया है संसारकारणनिवृत्ति प्रत्यागूर्णस्य ज्ञानवतो बाह्याभ्यन्तरक्रियाविशेषोपग्मः सम्यकनारित्रम् । संसारके कारणोंकी निवृत्तिके प्रति उद्यत हुए ज्ञानीके बाह और अभ्यन्तर क्रियाका उपग्म होना सम्यक्चारित्र है।
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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