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________________ जयपुर (सानिण तस्वनी और नमको समीक्षा है । (आप्तमीमांसा कारिका ५८ ।) प्रकृतमें आचार्य अमृतचन्द्र ने इसी म्यायसे पुरुषार्थसिद्धयुपायमें 'येनांशेन विशुद्धिः' इत्यादि वचन लिखे हैं । रागका कारण कर्मोपाधिमे मयुक्त होकर परिणमना है और निश्चय रलयका कारण जायक स्वभाव आत्माके आलम्बन द्वारा तन्मय होकर परिणमना है। रागका (शुभाशुभका) लक्षण पराश्रय भाव करना है और रत्नत्रयका लक्षण शुद्ध चतन्यका स्वायय प्रकाशमान है। रागका फल संसारको परिपाटी है औ निश्चय रत्नत्रयका फल शुद्ध आत्माकी प्राप्ति है। इस प्रकार कारणभेद, लक्षणभेद और कार्यभेदसे ये दोनों भिन्न-भिन्न है. एक नहीं है। ऐसी अवस्था में इन्हें मिश्रित कहकर दोनोंका कार्य आरव और बन्ध तथा संवर और निर्जरा मानना संगत नहीं है । जब फि अपर पक्ष ही उन्हें मिश्रित स्वीकार करता है तो इससे वे दो अंश सुतरां सिद्ध हो जाले हैं । इससे नो वे दोनों अंश मिले हुए सरीने दौखते हैं, एक नहीं हैं यही सिद्ध होता है । और जब कि में दोनों एक नहीं है, दो हैं तो उनके दो होनेका कारणभेद, कार्यभेद और लक्षणभेद भी अपर पक्षको निर्विवाद रूपमें स्वीकार कर लेना चाहिए। साष्ट है कि शुभभावका कार्य निश्चयस एकमात्र आस्रव और बन्ध है तथा निश्चय रत्नत्रयका कार्य एकमात्र संवर और निर्जरा तथा अन्तमें मोक्ष है यही सिद्ध होता है । एक बात और है कि रागभाव और रातपर्याय विकारसंपृक्त और विभावभाव होनेसे स्वयं बन्धस्वरूप है । ऐसी अवस्थामें वह संदर और निर्जराका हेतु कैसे हो सकता है, अर्थात् त्रिकालमें नहीं हो सकता। संबर और निर्जराका हेतु वही हो सकता है जो स्वयं संवर-निर्जरास्वरूप है । फिर भी अगर पक्ष निश्चयसे रागको यदि संघर और निर्जराका हेतु मानना चाहता है तो उसका यह मानना रागको संवर, निजरा और मोक्षस्वरूप मानना ही कहा जायगा, क्योंकि आगमका ऐसा अभिप्राय है कि निश्चयसे जो जिसका हेतु होता है वह स्वयं तत्स्वरूप ही होता है। किन्तु जहाँ जितने अंश वीतरायता उत्पन्न होती है वह उतने अंशमैं रागका अभाव होकर ही उत्पन्न होती है, अतः राग निश्चयसे वीतरागताको विकालमें उत्पन्न नहीं कर सकता ऐसा ही यहाँ निर्णय करना चाहिए । फिर भी आयममें जो रागको निश्चय.रत्नत्रयका व्यवहारमयसे हेतु कहा गया है वह सहबर सम्बन्धको देखकर उपचारसे ही कहा गया है। विवक्षित रत्नत्रयके साथ विवक्षित रागांशके रहने में कोई हानि नहीं यह ज्ञान कराना ही इसका प्रयोजन है। इसी तथ्यको स्पष्ट करते हुए समयसार कलशमें कहा है यावत्पाकमुपैति कर्मविरत्तिर्ज्ञानस्य सम्यङ, न सा कर्मज्ञानसमुच्चयोऽपि विहितस्तावन्न काचित्क्षतिः । किन्त्वत्रापि समुल्लसत्यवशतो यत्कर्म बन्धाय तत् मोक्षाय स्थितमेकमेव परमं ज्ञानं विमुक्तं स्वतः ॥११॥ जब तक ज्ञानकी कर्मविरति भलीभांति पूर्णताको नहीं प्राप्त होती तबतक फर्म और ज्ञानको समुच्चय भी विहित है, उसमें कोई हानि या विरोध नहीं । किन्तु इस अवस्थामें भी आत्मामें अवकापने जो फर्म उदित होता है वह तो बन्धका हेतु है और परद्रव्य-भावोसे स्वयं भिन्न जो परम शान है वह एक ही मोक्ष का हेतु है ॥११॥ इस प्रकार पूर्वोक्त कथनस अपर पक्षक इस मतका खण्डन हो जाता है कि चतुर्थादि गुणस्थानोंमें रागांश और रत्नत्रयांशरूप जो मिश्रित शुभभाव है वह आनच और बन्धका भी हेतु है तथा संवर और
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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