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________________ ११२ जयपुर (खानिया) तश्वचर्चा और उसकी समीक्षा आदि व्यवहार धर्म नहीं बन सकता। हमारी समझसे यह बात अपर पक्ष को भी मान्य होगी, अतः अपर पक्षको निःसंकोचरूपसे ग्रह स्वीकार कर लेना चाहिए कि पुण्यबन्धरूप जीवदया सम्यग्दृष्टियोंके भी होती है। अपर पक्षने अपने प्रतिशंकारूप दूसरे पत्रक में विविध ग्रन्थोंके अनेक आगमप्रमाण दिये हैं । यह सच हैं और उनमें से कुछ में जीवदया धर्म है तथा शुभभावसे कर्मक्षय होता है यह भी कहा गया है। किन्तु कहाँ किस का नयदृष्टिसे क्या आशय है इसका स्पष्टीकरण करना विवेकियोंका काम है । हमने अपने दूसरे उत्तरमें वही किया है। क्या इसे आर्ष ग्रंथोंकी प्रामाणिकता पर अपर पक्ष द्वारा अप्रामाणिकताकी अंगुली उठाना कहना उपयुक्त है ? इसका अपर पक्ष स्वयं विचार करे। यदि यही बात है तो वह स्वयं अपने को इस दोषसे बरो नहीं रख सकता । अपर पक्षको यह समझना चाहिए कि किसी मवाक्यको अप्रमाणित घोषित करना अन्य बात है और वहाँ जिस दृष्टिले विवेचन किया गया है, नयदृष्टिसे उसके आशयको खोलना अन्य बात है । अपर पक्ष यदि व्यवहारधर्म और निश्चयधर्म दोनों को मिलाकर निश्चयधर्म कहना चाहता है और वह हमसे भी ऐसा कहलावेदिता रहा है उसकी वह जाम हमारे द्वारा कभी भी पूरी नहीं की जा सकेगी। जब कि जिनागममें ये दो भेद किये हैं और उनके कारणों तथा फलका अलगअलग विवेचन किया है ऐसी अवस्थामें हम तो वही कहेंगे जिसे स्थान-स्थान पर जिनागममें स्पष्ट किया गया है । श्री प्रवचनसारमें शुभ, अशुभ और शुद्ध भावका निर्देश करते हुए लिखा हैजीवो परिणमदि जदा सुहेण असुद्देण वा सुहो असुहो । सुद्वेण तदा सुद्धो हवदि हि परिणामसब्भावो ॥९॥ परिणामस्वभावाला यह जीव जब शुभ या अशुभरूपसे परिणमता है तब शुभ या अशुभ होता है छौर जब शुद्धरूपसे परिणमता है तब शुद्ध होता है ॥ ९ ॥ आगे इनमें से किसमें उपादानबुद्धि की जाय और किसमें त्यागबुखि रखी जाय इस अभिप्रायसे इनके फलका निर्देश करते हुए लिखा है धम्मेण परिणदप्पा अप्पा जदि सुद्धसंपयोगजुदो । पावदि णिव्वाणसुहं सुहोवजुत्तो व सग्गमुहं ॥११॥ धर्म से परिणित स्वभाववाला यह आत्मा यदि शुद्धोपयोग में युक्त होता हूँ तो मोक्षसुखको प्राप्त करता हैं और यदि शुभोपयोगबाला होता है तो स्वर्गसुखको प्राप्त करता है ॥११॥ आगम प्रमाण है। इनकी प्रामाणिकता पर कोई भी श्रद्धालु बन्धु अप्रामाणिकताकी अंगुली उठानेका साहस नहीं कर सकता। ऐसी अवस्थामें दूसरे जीवोंको दयारूप शुभभावों को यदि हमने पुण्यबन्धका कारण लिखा तो आगमकी अवहेलना कहीं हुई । इस कथन द्वारा तो हमने आगमका रहस्य खोलकर मोक्षमार्ग ही प्रशस्त किया। क्या अपर पक्ष यह चाहता है कि प्रत्येक भव्य जीव परजीवोंको दयाको मोक्षका कारण जान उसीमें उलझा रहे मोर आत्मस्वभाव के सम्मुख हो सच्चे आत्मकल्याणके मार्ग में न लगे। हम नहीं समझते कि वह ऐसा चाहता होगा। यदि यही बात है तो शुभ और अशुभ भावों में अन्तर तो करना ही चाहिए। दृष्टिपथ में लेना चाहिए । उस पक्षको प्रवचनसारके उक्त उल्लेखोंके आधारपर साथ ही उनके कारणभेद और फलभेदको भी अपने
SR No.090217
Book TitleJaipur Khaniya Tattvacharcha Aur Uski Samksha Part 1
Original Sutra AuthorVanshidhar Vyakaranacharya
AuthorDarbarilal Kothiya
PublisherLakshmibai Parmarthik Fund Bina MP
Publication Year
Total Pages504
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Questions and Answers
File Size14 MB
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