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________________ ! · काव्यभावार्थ- जिस वचनगुप्ति के होने पर असत्य आदि पाप दूर हो जाते हैं और पापों के होने से अगणित गुणों का विकास हो जाता है। इसलिए संसार की आपदाओं का शीघ्र ही अन्त चाहनेवाले हम उदासीन मानवों के मन में वह 'वचनगुप्ति' उदित हो, अतएव उसका हम अर्घ्यद्रव्य से पूजन करते हैं। यह काव्य वंशस्य छन्द के माध्यम से शान्तरस की वर्षा करता है । ईर्यासमिति (समीक्षित गमन) व्रत का अर्चन प्रमादमुक्त्वा युगमात्रदृष्ट्या स्पष्टे करैरुष्णकरस्य मार्गे । या वै गतिः सा समितिः किलेयां, मान्या मुनीनां हृदये ममास्ताम् ॥' काव्यसौन्दर्य - सूर्य की किरणों से मार्ग के स्पष्ट होने पर प्रमादरहित होकर चार हाथ आगे ज़मीन देखते हुए जो गमन तथा आगमन होता है, मुनिराजों द्वारा मान्च वह 'ईयासमितित्रत हमारे जीवन में सम्पन्न हो। इस भावना से हम अध्यंद्रव्य द्वारा ईयसमितिव्रत का अर्चन करते हैं। इस काव्य में वंशस्थ उन्द शोभित होता है। जीवन के कष्ट तथा जीवहिंसा को दूर करने के लिए योग्य गमन और आगमन का निर्दोष कथन किया गया है। उत्कृष्ट चारित्र को नमस्कार ममतारजनीदिवसाधिपतिं प्रकटीकृतसत्यपरात्महितम् । परमं शिवसौधनिवासकरं चरणं प्रणमामि विशुद्धतरम्॥ काव्यसार - मोहरूपी रात्रि के लिए सूर्य के समान, सत्य को प्रकाशित करनेवाले, दूसरे मानवों का और अपना हित करनेवाले, सर्वश्रेष्ठ मोक्षरूपी महला में प्राप्ति करानेवाले उस उत्कृष्ट और विशुद्ध चारित्र (आचरण) को हम प्रणाम करते हैं। इस काव्य में तोटक छन्द कर्णप्रियध्वनि को, यमक-उपमा अलंकार शोभा को और शान्तरस आत्मानन्द को व्यक्त करता है मानव को चारित्र प्राप्ति के लिए प्रेरणा विरमविरम संगान् मुंच मुंच प्रपंच विसृज विसृत मोहं विद्धि विद्धि स्वतत्त्वम् । कलय कलय वृत्तं पश्य पश्य स्वरूपम्, कुरु कुरु पुरुषार्थं निर्वृतानन्तहेतोः ॥ * । ज्ञानपीठ पूजांजलि, पृ. 2. तथैव पृ. 255 3. तथैन, पृ. 297 2:30:: जैन पूजा - काळा एक चिन्तन
SR No.090200
Book TitleJain Pooja Kavya Ek Chintan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDayachandra Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year
Total Pages397
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Devotion
File Size7 MB
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