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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org ज्ञान- प्रदीपिका ( ज्योतिषशास्त्रम् ) Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रीमदुवीर जिनाधीशं सर्वज्ञं त्रिजगद्गुरुम् । प्रातीहार्याष्टकोपेतं प्रकृष्टं प्रणमाम्यहम् ॥१॥ त्रलोक्यनायक, सर्वज्ञ, अशोक वृक्षादि आठ प्रातिहार्यों से युक्त, प्रकृष्ट श्रीमहावीर - स्वामी को मैं प्रणाम करता हूँ । स्थित्युत्पत्तिव्ययात्मीयां भारतीमाहिती सतीम् । अतिपूतामद्वितीयामहर्निशमभिष्टुवे ॥२॥ स्थिति, उत्पत्ति और प्रलयस्वरूपिणी, पूज्या सती, अत्यन्त पवित्र और अद्वितीय श्रीजिनवाणी देवी को मैं ( ग्रन्थकार ) रातदिन स्तुति करता हूँ ! ज्ञानप्रदीपकं नाम शास्त्रं लोकोपकारकम् । प्रश्नादर्श प्रवक्ष्यामि पूर्वशास्त्रानुसारतः ॥३॥ पहले के कहे हुए शास्त्रोंके अनुसार लोक के उपकारक ज्ञानप्रदोपिका नामक प्रश्नतंत्र के आदर्श शास्त्र को कहूंगा । भूतं भव्यं वर्तमानं शुभाशुभनिरीक्षणम् । पंचप्रकारमार्ग च चतुष्केन्द्रवावलम् ॥४॥ आरुडछत्रवर्गं चाभ्युदयादिबलाबलम् । क्षेत्रं दृष्टिं नरं नारीं युग्मरूपं च वर्णकम् ॥५॥ मृगादिनररूपाणि किरणान्योजनानि च । आयूरसोदयाद्यञ्च परीक्ष्य कथयेद् बुधः ॥६॥ For Private and Personal Use Only
SR No.090186
Book TitleGyan Pradipika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamvyas Pandey
PublisherNirmalkumar Jain
Publication Year1934
Total Pages159
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size9 MB
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