SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 130
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org ज्ञानप्रदीपिका | उच्चेन दृष्टे युक्ते वा अर्ध्यवृद्धिर्भविष्यति । नीचेन युक्ते दृष्टे वा अर्ध्यक्षयमितीरितम् ॥ १॥ मित्रस्वामिवशात् सौम्यामित्रं ज्ञात्वा वदेत्सुधीः । दृष्टे वृद्धिर्भविष्यति ॥२॥ शुभ युत वा दृष्ट होने पर क्षति होती हैं। पाप का पूर्ण विचार करना चाहिये । उसे दृष्ट किंवा युक्त होने पर अर्थ ( अन्न का मात्र ) को वृद्धि और नीव से इस विषय में विद्वान को मित्र, शत्रु, स्वामी, शुभ, शुभ ग्रह से युत दृष्ट होने पर अर्ध ( दर ) की वृद्धि होगी । पापग्रहयुते दृष्टे वर्ध्यवृद्धिक्षयो भवेत् । नीचशत्रुवशान्न्यूनमर्थ्य निर्णय मोरितम् ॥३॥ Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir लग्न यदि पाप ग्रह से युन या दृष्ट हो तो दर को बढ़वारी घटेगा नोव और शत्रु के श से इसकी न्यूनता का निर्णय कहा जाता है। इत्यर्ध्यकाण्डः ू जलराशिषु लग्नेषु जोवशु कोदयो यदि । पोतस्यागमनं याशुनश्चन्न सिद्ध्यति ॥ १ ॥ लग्न में जल राशि हो और उसमें वृहस्पति और शुक्र पड़े हों तो जहाज शीघ्र लोटेगा 1 यदि अशुभ ग्रह हों तो काम सिद्ध नहीं होगा । आरूढ केन्द्रलग्नेषु वीक्षितेष्वशुभग्रहैः । पोतभंगो भवति च शत्रुभिर्वा तथा वदेत् ॥२॥ आरूढ, केंद्र ( १, ४, ७, १०) को यदि अशुभ ग्रह देखते हों तो शत्रुओं ने जहाज लूट लिया है - ऐसा - ऐसा बताना । अदृष्टस्योदये लग्ने शुभे नौका व्रजेत्स्वयम् । तदग्रहे तु यथा दृष्टे तथा नौदर्शनं भवेत् ॥३॥ For Private and Personal Use Only
SR No.090186
Book TitleGyan Pradipika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamvyas Pandey
PublisherNirmalkumar Jain
Publication Year1934
Total Pages159
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size9 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy