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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ज्ञानप्रदीपिका । ०१ सब के हितार्थ यात्रा काण्ड कहता हूँ । इस काण्ड से गमन आगमन लाभ हानि, शुभ, अशुभ आदि बातें विचार कर कहनी चाहिये । मित्रक्षेत्राणि पश्यन्ति यदि मित्रग्रहास्तदा || २ || मित्राय गमनं ब्रूयात् नीचं नीचग्रहाणि (?) च । नीचाय गमनं ब्रूयात् उच्चानुच्चग्रहाणि (?) च ॥३॥ यदि मित्रक्षेत्रको मित्रग्रह देखते हों तो मित्र के लिये गमन कहना चाहिये । योंही यदि नीच ग्रह नीच स्थानों को देखते हों तो नीच के लिये और उच्च ग्रह देखते हों तो अपने से उच्च के पास यात्रा बतानी चाहिये । स्वाधिकाये (?) तिगमनं पुंराशि पुंग्रहा यदि । स्त्रिया गमनमित्युक्तमन्येत्येवं विचारयेत् ॥ ४ ॥ पुरुष राशि को यदि पुंग्रह देखते हों तो स्त्रो के लिये गमन होता है । तियों में भी ऐसे ही विचार लेना चाहिये । चरराश्युदयारूदे तत्तद्ग्रहविलोकने । तत्तदाशासु तिष्ठन्ति पृच्छतां शास्त्र निर्णयः ||५|| र राशि यदि लग्न या आरूढ़ में हो तो जो ग्रह उन्हें देखता हो उसी की दिशा का प्रश्न कहना चाहिये ऐसा शास्त्रीय सिद्धान्त है I स्थिरराश्युदयारूढे शन्यर्काङ्गारकाः स्थिताः । अथवा दशमे वा चेद् गमनागमने न च ॥६॥ अन्य परिस्थि स्थिर राशि उदय या आरूढ़ में हों और शनि सूर्य और मंगल हो या दशम में भो ये हों तो गमन या श्रागमन नहीं होता । शुक्र सौम्येन्दुजीवाश्चेत् तिष्ठन्ति स्थिरराशिषु । विद्यते स्वेष्ट सिद्धयर्थं गमनागमने तथा ॥७॥ For Private and Personal Use Only यदि स्थिर राशि में शुक्र, बुध, चंद्र या वृहस्पति हों तो अपनी इष्टसिद्धि के लिये गमनागमन बताना चाहिये ।
SR No.090186
Book TitleGyan Pradipika
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRamvyas Pandey
PublisherNirmalkumar Jain
Publication Year1934
Total Pages159
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size9 MB
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