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________________ प्रथम खण्ड/प्रथम पुस्तक बीजावस्थायामपि न स्याटंकुरभवोऽरित वाऽसदिति । तस्मादुत्पादः स्यात्स्वावसरे चांकुरस्य नान्यत्र ।। २३६ ।। अर्थ-जो समय बीज पर्याय का है वह अंकुर की उत्पत्ति का नहीं कहा जा सकता। बीज पर्याय के समय अंकुर के उत्पाद का अभाव ही है। इसलिये अंकुर का उत्पाद भी अपने ही समय में होगा अन्य समय में नहीं। - यदि वा बीजांकुरयोरविशेषात् पाटयत्वमिति वाच्यम् । नष्टोत्पन्नं न तदिति नष्टोत्पन्नं च पर्ययाभ्यां हि ॥२३७ ।। अर्थ-अथवा बीज और अंकुर इन दोनों को सामान्य रीति से यदि वृक्ष कहा जाय तो वक्ष न तो उत्पन्न हुआ, और न वह नष्ट हुआ, किन्तु बीजपर्याय से नष्ट हुआ है और अंकुर पर्याय से उत्पन्न हुआ है। आयात न्यायबलादेतद्यन्त्रितयमेककाल स्यात् । उत्पन्नमंकुरेण चं नष्टं बीजेन पाटपत्वं तत् ॥ २३८ ॥ अर्थ-यह बात न्याय बल से सिद्ध हो चुकी कि उत्पाद व्यय धौव्य तीनों का एक ही काल है। वृक्ष का अंकुर रूप से जिस समय उत्पाद हुआ है, उसी समय उसका बीजरूप से व्यय हुआ है और वृक्षपना दोनों अवस्थाओं में मौजूद है। भावार्थ-ऊपर के तीनों श्लोकों का सारांश इस प्रकार है-जो बीज पर्याय का समय है वह उसके व्यय का समय नहीं है, क्योंकि उसी का सद्भाव और उसी का अभाव दोनों एक ही समय में नहीं हो सकते हैं किन्तु जो अंकुर के उत्पाद का समय है वही बीज पर्याय के नाश का समय है । ऐसा भी नहीं है कि बीज पर्याय और अंकुरोत्पाद इन दोनों के बीच में बीज पर्याय का नाश होता हो। ऐसा मानने से पर्याय रहित द्रव्य ठहरेगा क्योंकि बीज का तो नाश हो गया, अभी अंकुर पैदा नहीं हुआ है। उस समय कौनसी पर्याय मानी जावेगी? कोई नहीं। तो अवश्य ही पर्याय शून्य द्रव्य ठहरेगा। पर्याय के अभाव में पर्यायी का अभाव स्वयं सिद्ध है। इसलिये जिस समय अंकुर का उत्पाद होता है उसी समय बीजपर्याय का नाश होता है। दूसरे शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि जो बीजपर्याय का नाश है वही अंकर का उत्पाद है। इसका यह अर्थ नहीं है कि नाश और उत्पाद दोनों का एक ही अर्थ है। यदि दोनों का एक ही अर्थ हो तो जिसका नाश है उसी का उत्पाद कहना चाहिये परन्तु ऐसा नहीं है नाश तो बीज का होता है और उत्पाद अंकर का होता है परन्तु नाश और उत्पाद दोनों की फलित पर्याय एक ही है। ऐसा भी नहीं है कि जो बीजपर्याय का समय है वही अंकुर के उत्पाद का समय है। ऐसा मानने से एक ही समय में दो पर्यायों की सत्ता माननी पड़ेगी और एक में दो पर्यायों का होना प्रमाण-बाधित है इसलिये बीज पर्याय के समय अंकुर का उत्पाद नहीं होता है किन्तु जो बीजपर्याय के नाश का समय है वही अंकुर के उत्पाद का समय है और बीजनाश तथा अंकुरोत्पाद दोनों ही अवस्थाओं में वृक्षपने का सद्भाव है। वृक्ष का जिस समय बीज पर्याय से नाश हुआ है, उसी समय उसका अंकुर पर्याय से उत्पाद हुआ है। वृक्ष का सद्भाव दोनों ही अवस्थाओं में है। इसलिये यह बात अच्छी तरह सिद्ध हो गई कि उत्पाद, व्यय, धौव्य तीनों का एक ही समय है भिन्न-भिन्न नहीं है। जैसे एक मनुष्य मरकर देव हुआ।अब जो मनुष्य पर्याय का समय है वह तो मनुष्य पर्याय का है और जो देव पर्याय का समय है वह देव पर्याय का ही है किन्तु जो मनुष्य के नाश और देव की उत्पत्ति का समय है वह एक है और उस उत्पाद व्यय में उसी समय ध्रुव जीव न उत्पाद है न व्यय है किन्तु धुव है यह सारे कथन का फलितार्थ है। अपि चांकुरसृष्टेरिह य एत समयः स बीजनाशस्य । उभयोरप्यात्मत्वात स एव कालश्च पादपत्वस्य ॥ २३९ ।। अर्थ-जो अंकुर की उत्पत्ति का समय है, वही समय बीज के नाश का है और अंकुर का उत्पाद तथा बीज का नाश दोनों ही वृक्ष स्वरूप हैं। इसलिए जो समय बीज के नाश और अंकर के उत्पाद का है वही समय वृक्ष के धौव्य का है।
SR No.090184
Book TitleGranthraj Shri Pacchadhyayi
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
Author
PublisherDigambar Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year
Total Pages559
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size18 MB
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