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________________ ग्रन्थराज श्री पञ्चाध्यायी समाधान १८३ से १९२ तक नैवं यतः स्वभावादसतो जन्म न सतो विनाशो वा । उत्पादादित्रयमपि भवति च भावेज भावतया ।। १८३॥ अर्थ-उपर्युक्त जो शंका की गई है वह ठीक नहीं है क्योंकि यह एक स्वाभाविक बात है कि न तो असत् पदार्थ का जन्म होता है और न सत् पदार्थ का विनाश ही होता है। जो उत्पाद-व्यय-धौव्य होते हैं वे भी वस्तु के एक भाव से भावान्तर रूप हैं। भावार्थ-जो पदार्थ है ही नहीं वह तो कहीं से आ नहीं सकता और जो उपस्थित है वह कहीं जा नहीं सकता। इसलिये न तो नवीन पदार्थ की उत्पत्ति ही होती है और न सत् पदार्थ का विनाश ही होता है किन्तु हरएक वस्तु में प्रति समय भाव से भावान्तर होता रहता है। भाव से भावान्तर क्या है ? इसका खुलासा नीचे किया जाता है: अयमर्थः पूर्वं यो भावः सोऽप्युत्तरत्र भावश्च । भूस्वा भवनं माता मधोत्पन्न न भाव इह कश्चित् ॥ १८४ ॥ अर्थ-इसका यह अर्थ है कि पहले जो भाव था वही उत्तर भाव रूप हो जाता है । होकर होने का नाम ही भाव है। सर्वथा नष्ट और उत्पन्न कोई भाव नहीं होता है। भावार्थ-आकार का नाम ही भाव है। वस्तु का एक आकार बदल कर दूसरे आकार रूप हो जाय, इसका नाम भाव से भावान्तर कहलाता है। हरएक वस्तु में प्रतिक्षण इसी प्रकार एक आकार से आकारान्तर होता रहता है। किसी नवीन पदार्थ की उत्पत्ति नहीं होती और न किसी सत् पदार्थ का विनाश ही होता है। दृष्टान्तः परिणामी जलप्रवाहो य एव पूर्वस्मिन् । उत्तरकालेऽपि तथा जलप्रवाहः स एव परिणामी || १८५ ।। अर्थदृष्टान्त के लिए जल का प्रवाह है। जो जल का प्रवाह पहले समय में परिणमन करता है वही जल का प्रवाह दूसरे समय में परिणमन करता है। यत्तत्र विसदृशत्वं जातेरनतिक्रमात् कमादेव । अवगाहनगुणयोगाद्देशाशाना सतामेव ॥१८६ ॥ अर्थ-यह जो द्रव्य की एक अवस्था से दूसरी अवस्था में भिन्नता ( असमानता ) दीखती है वह अपने स्वरूप को नहीं छोड़कर क्रम से होनेवाले देशांशों के अवगाहन गुण के निमित्त से ही दीखती है। पहला दृष्टांत दृष्टांतो जीवस्य लोकासंरव्यातमात्रदेशाः स्युः । हाजिर्वद्भिरतेषामवगाहनविशेषतोनतु द्रव्यात् ॥ १८७ ।। अर्थ-दृष्टान्त इस प्रकार है। एक जीव के असंख्यात लोक प्रमाण प्रदेश होते हैं । उनकी हानि अथवा वृद्धि केवल अवगाहन की विशेषता से ही होती है । द्रव्य की अपेक्षा से नहीं होती। ___ भावार्थ-जीव के जितने भी (असंख्यात् ) प्रदेश हैं। वे सदा उतने ही रहते हैं। न तो उनमें से कभी कुछ प्रदेश घटते हैं और न कभी कुछ प्रदेश बढ़ते हैं। किन्तु जिस शरीर में जितना छोटा या बड़ा क्षेत्र मिलता है, उसी में अपने कारण से उसके अनुसार संकुचित अथवा विस्तृत हो जाते हैं। चींटी के शरीर में भी वही असंख्यात् प्रदेश वाला आत्मा है और हाथी के शरीर में वही असंख्यात् प्रदेश वाला आत्मा है। आत्मा दोनों स्थानों में उतना ही है जितना कि वह है। केवल एक आकार से आकारान्तर रूप हो गया है।आकार से आकारान्तर को ग्रहण करने की अपेक्षा से ही आत्मा के प्रदेशों की हानि-वृद्धि समझी जाती है। वास्तव में उसमें किसी प्रकार की हानि अथवा वृद्धि नहीं होती। इसे ही हानि वृद्धि -
SR No.090184
Book TitleGranthraj Shri Pacchadhyayi
Original Sutra AuthorAmrutchandracharya
Author
PublisherDigambar Jain Sahitya Prakashan Mandir
Publication Year
Total Pages559
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size18 MB
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