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प्रथम खपद्ध/तृतीय पुस्तक
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भावार्थ - इस सूत्र का पेट तो सूत्रकार का बहुत बड़ा है फिर भी उस पर कुछ प्रकाश डालना हमारा कर्तव्य है। इसमें वह यह कहना चाहते हैं कि प्रत्येक सत् (जीवादि छहों द्रव्य) अनेक भावात्मक एक वस्तु है। उस पर सर्वज्ञाज्ञानुसार नय प्रमाणों का प्रयोग करना चाहिये।ा कि कारोवाकावे आपको दिखलाते है :(१) पहले एक अशुद्ध संसारी जीव को लीजिये। उसका आपको ज्ञान करना है तो सबसे पहले शुद्ध द्रव्यार्थिक नय से यह जानने की आवश्यकता है कि वह सत् लक्षण वाला है, अनादि अनन्त है, स्वसहाय है, स्वतः सिद्ध है, किसी ईश्वरादि से उत्पन्न नहीं है और द्रव्य,गुण, पर्याय, उत्पाद, व्यय,धौव्य या द्रव्य, क्षेत्र,काल, भाव से किसी प्रकार भी इसका खण्डखण्ड नहीं हो सकता है। इससे जैसी वस्तु अखण्ड है वैसी आपकी पकड़ में आ जायेगा।(२)फिर उसके अंग-प्रत्यंग को जानने के लिये उसमें काल्पनिक भेद ( किन्तु विधि पूर्वक)करने होंगे। सबसे पहले उसकी लम्बाई जानने के लिये यह जानने की आवश्यकता है कि वह असंख्यात प्रदेशी है। फिर यह भी दो नय से। शुद्धद्रव्यार्थिक नय से अखण्ड देश है, पर्यायार्थिक नय से एक एक प्रदेश अपने भिन्न-भिन्न लक्षण से भिन्न-भिन्न है तथा प्रमाण से जो असंख्यात प्रदेश रूप है वह अखण्ड देश है। फिर (३) उस जीव की लम्बाई जानने के लिये यह जानने की आवश्यकता पड़ती है कि वह अनन्त गुणों का बना हुआ एक अखण्ड पिण्ड है। द्रव्य दृष्टि से वह अखण्ड एक है। गुण भेद नहीं है। पर्याय दृष्टि से प्रत्येक गुण भिन्न-भिन्न है। तथा प्रत्येक गुण को जानने की उसी नाम की एक-एक नय है। जो प्रत्येक गुण का भिन्न-भिन्न ज्ञान करा देती है। (५८८ से ५९६ तक)।
फिर प्रत्येक गुण का लक्षण कार्य इत्यादि जानने के बाद यह जानने की आवश्यकता है कि उसके प्रत्येक गुण के अनन्त अविभाग प्रतिछेद हैं। द्रव्य दृष्टि से वह अखण्ड गुण है और पर्याय दृष्टि से उसमें अनन्त अविभाग प्रतिच्छेद हैं। इससे आपको जीव द्रव्य के सर्वस्वसार का परिज्ञान हो जायेगा (४) फिर उन गुणों का परिणमन जानने की आवश्यकता है। प्रत्येक गुण परिणमनशील हैं। प्रत्येक समय हानि-वृद्धि किया करता है। चार द्रव्यों में तो वह हानिवृद्धि स्वभाव रूप ही होती है किन्तु जीव में सिद्ध होने तक विभाव रूप से भी होती है तथा पुद्गल में स्कन्ध दशा होने पर विभाव रूप होती है और शद्ध परमाणु दशा होने पर स्वभाव रूप होने लगती है। उसमें फिर यह समझने की आवश्यकता है कि अन्वय दृष्टि से तो गुण त्रिकाल एक रूप रहता है और पर्याय दृष्टि से अपनी योग्यता के कारण हीनाधिक भी होता है। इन दोनों दृष्टियों को बराबर समझ लेने की आवश्यकता है।फिर कुछ गुणों में विभाव परिणमन भी होता है। वह उसी गुण का परिणमन है। उस द्रव्य के चतुष्टय में है। उसी की स्वकाल योग्यता से हुआ है। वह उस द्रव्य में है इसलिये तो नय अवश्य लागू होगी किन्तु वह उसमें क्षणिक है - निकल सकता है इसलिये उसका अस्तित्व उसमें असद्भूत व्यवहार नय से है। इससे उसकी वर्तमान स्थिति भी ख्याल में आयेगी तथा वह त्रिकाली स्वभाव के आश्रय से असद्भुत होने के कारण निकाला जा सकता है यह भी ख्याल में आ जायेगा।
फिर वह विभाव बुद्धिपूर्वक-अबुद्धिपूर्वक दो प्रकार का है एक उपचरित असदभूत का विषय है दूसरा अनुपचरित का विषय है यह जानना होगा। इससे पुरुषार्थ के द्वारा बुद्धिपूर्वक को नाश करने से अबुद्धिपूर्वक स्वयं नष्ट हो जाता है उनमें अविनाभाव है। साध्यसाधन भाव है। यह जानने की जरूरत है। फिर उसमें केवल स्वभाव रह जायेगा। वह स्वभाव बिना पर के उपचार नहीं हो सकता इसलिये इसको पर से उपचार करना पड़ता है जैसे ज्ञान स्वपर का ज्ञायक है यह उपचरित नाम की सद्भुत नय है क्योंकि ज्ञान उसमें है इसलिये सद्भुत और पर से उपचार किया जाता है इसलिये उपचरित।फिर वह उपचार भी छोड़ना पड़ता है और यह ख्याल आता है कि अरे वह तो द्रव्य की स्वतःसिद्ध अनुजीविनी शक्ति है। अपने कारण से जीती है। ऐसा जानने से पर से उपचरित बुद्धि आपमें से निकल जायेगी और वह स्वतः सिद्ध अनुपचरित वस्तु है यह बराबर ख्याल आयेगा। इस प्रकार प्रत्येक गुण की स्थिति आपके लक्ष्य में आ जायेगी। फिर' उस द्रव्य के सब अनन्त गुणों का ज्ञान होने पर यह जानने की जरूरत पड़ेगी कि यह गुण भेद तो व्यवहार नय से है। वास्तव में वह अखण्ड वस्तु है। उसमें गण भेद कहाँ। ये तो भेद दष्टि से लक्ष में आ रहे थे। इस प्रका सामान्य सत् वस्तु जैसी है वैसी आपके ज्ञान में आने लगेगी। इस प्रकार इस नय प्रमाण ज्ञान की सहायता से जीव अपने में प?
बस इसी सामान्य जीव वस्तका जहाँ उपयोग ने आश्रय लिया कि स्वभाव पर्याय रूप सम्यग्दर्शन प्रगट हुआ। उसके होते ही यह सब ज्ञान सम्यग्ज्ञान हो जायेगा और उस सामान्यस्वभाव की स्थिरता रूप चारित्र द्वारा थोड़े ही समय में जीव अपने स्वभाव को पाकर सिद्ध हो जायेगा। इस प्रकार सत्रकार का आशय नयों को यथायोग्य