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परिशिष्ट - ३
लक्षणावलि
पारिभाषिक शब्द
लक्षण
अघातिया
अधुववन्ध
अधःप्रवृत्तकरण
अध:प्रवृत्तसंक्रमण भागहार
अनन्तानुबन्धी
जीव के देवत्वगुण को नहीं घातनेवाले कर्म अघातिया हैं। (ज.ध.पु.१ पृ. ६७) (गाथा ९ टीका) जिस बन्ध का अभाव हो जाएगा वह अध्रुवबन्ध है। (गाथा ९०, १०३ टीका) उपरितनसमयवर्ती भाव (परिणाम) अधस्तनसमयसम्बन्धी भावोंके समान होते हैं इसलिए अध:प्रवृत्तकरण नाम अन्वर्थ है। (गाथा ८९८ टीका) बन्धप्रकृतियोंका अपने बन्धके साम्भव विषयमें जो प्रदेशसंक्रम होता है उसे अधःप्रवृत्तसंक्रम कहते हैं। उसका प्रतिभाग पल्य का असंख्यातवाँ भाग है। (गाथा ४०१ टीका) अनन्तसंसारका कारण होनेसे मिथ्यात्व अनन्त है, उस मिथ्यात्वकी जो चिरसङ्गिनी (अनुबन्धिनी) है वह अनन्तानुबन्धीकषाय है। (गाथा ३३ टीका) अनादिकालसे संततिरूप जिस बन्धका अभाव नहीं हुआ है, वह अनादिबन्ध है। (गाथा ९०, १२३ टीका) 'अनुकर्षणमनुष्टिः ' परिणामोंकी परस्पर समानता का विचार करता, यह अनुकृष्टि का एक अर्थ है। (गाथा ९०५ टीका) यह पर्यायार्थिकनयका विषय है। जहाँ सत्त्व नहीं वहाँ अभाव है। भावक्री उपलब्धि होनेपर अभाव का विरोध है, क्योंकि सद्भावके निषेधबिना अभाव नहीं हो सकता। (गाथा ९४ टीका) जो परिणाम संक्लेश अथवा विशुद्धि से प्रतिसमय बढ़ते ही जार्वे या घटते ही जावें पुनः पूर्वावस्था को प्राप्त न हों उन्हें अपरिवर्तमानपरिणाम कहते हैं। (गाथा १७७ टीका)
अनादिबन्ध
अनुकृष्टि
अनुत्पादानुच्छेद
अपरिवर्तमान-मध्यम परिणाम