SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 840
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-८०१ १९८ १९० १८६ १८२ १७८ ४२ १६६ १६२ पढम पढमं खंडं, अण्णोण्णं पेखिदूण विसरित्थं । हेडिल्लुक्कस्सादोणंतगुणादुवरिमजहण्णं ॥९५६ ॥ अर्थ-इसप्रकार अनुकृष्टिरचनामें प्रथमादि गुणहानियोंमें अनुकृष्टिका प्रथम-प्रथमखण्ड परस्परमें विसदृश (असमान) हैं इसलिए तिर्यप रचनामें ऊपर-ऊपर रचनारूप प्रथम-प्रथमखण्ड अन्तिमनिषेकके प्रथमखण्डपर्यन्त एक-एकचयप्रमाण अधिक है अर्थात् अपने-अपने नीचे के प्रथम खण्डके उत्कृष्ट स्थान से ऊपरके प्रथमखण्ड के जघन्य स्थान चयप्रमाण अधिक हैं और शक्ति की अपेक्षा अनन्तगुणे हैं। विदियं विदियं खंडं, अण्णोण्णं पेक्खिदूण विसरित्थं । हेहिल्लुक्कस्सादोणंतगुणादेवरिमजहण्णं ॥९५७ ।। अर्थ-गुणहानियोंमें प्रथमादि निषेकोंका द्वितीय-द्वितीयखंड गुणहानिके अंतिम-निषेकके द्वितीयखण्डपर्यन्त निरन्तर एक-एक चयप्रमाण अधिक है इसलिए समान नहीं है, क्योंकि अधस्तनद्वितीयखण्डके उत्कृष्ट स्थानसे उपरितनद्वितीयखण्डके जघन्यस्थान चयअधिक और शक्तिकी अपेक्षा अनन्तगुणा है तथा ऐसे ही तृतीय-तृतीयआदि खण्डोंमें असमानता जान लेना । इसप्रकार एककम अनुकृष्टिप्रमाण खण्डोंकी असमानता होती है। अब अन्तिमखण्डों की परस्पर में असमानता बताते हैं - चरिमं चरिमं खंड, अण्णोण्णं पेक्खिदूण विसरित्थं । हेडिल्लुक्कस्सादोणतगुणादुधरिमजहण्णं ॥ ९५८ ।।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy