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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७८८
__ अर्थ - ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय और अन्तरायकर्मकी उत्कृष्ट स्थिति ३० कोड़ाकोड़ीसागरकी है अतः इनकी अन्योन्याभ्यस्तराशिका प्रमाण असंख्यातपल्यके द्वितीयवर्गमूलसे गुणित तृतीयवर्गमूल प्रमाण है तथा नाम व गोत्रकर्मकी उत्कृष्टस्थिति २० कोड़ाकोड़ीसागर है अत: इनकी अन्योन्याभ्यस्तराशिका प्रमाण असंख्यातपल्यके द्वितीयवर्गमूलप्रमाण है। आयुक्रर्ममें संख्यातप्रतिभाग नियमसे होते हैं अतएव बद्रिमान् मनुष्यको विवक्षित रशानों को जानकर विवक्षित स्थितिकी नानागुणहानि शलाकाको जानना चाहिए।
विशेषार्थ - आयुकर्मके स्थितिभेट विलक्षण ही हैं अत: उसकी नानागुणहानिशलाका स्थितिके बँटवारेके अनुसार है । ७० कोड़ाकोड़ीसागरप्रमाण स्थितिकी नानागुणहानिशलाका पल्यकी वर्गशलाकाके अर्धच्छेदोंसे हीन पल्यके अर्धच्छेदप्रमाणहोती है तो ३३ सागरस्थितिकी कितनी नानागुणहानिशलाका होगी? इसप्रकार त्रैराशिकविधिसे जानकर बुद्धिमान् जीव विवक्षित आयुकर्मकी स्थितिकी नानागुणहानिशलाका का प्रमाण प्राप्त करे। इसप्रकार एकगुणहानिआयाम व नानागुणहानिशलाका अथवा निषेकभागहार तथा अन्योन्याभ्यस्तराशि जानना । इसीको कहते हैं
उक्कस्सट्ठिदिबंधे, सयलाबाहा हु सव्वठिदिरयणा।
तकाले दीसदि तोधोधो बंधट्टिदीणं च ।१९४० ।। अर्थ - विवक्षित प्रकृतिका उत्कृष्टस्थितिबन्ध होनेपर उप्तीसमय उत्कृष्ट आबाधा और सर्वस्थितिनिषेकोंकी रचना भी होती है। इसीकारण उस स्थितिके अंतिमनिषेकसे नीचे-नीचे प्रथमनिषेकपर्यन्त स्थितिबन्धरूप निधकोंकी एक-एक समयहीन स्थिति होती है।
A अन्तिमनिषेक
एकसमयकी
स्थिति/ ५१२
___ आबाथा |३०००
अब आबाधाकाल के व्यतीत होने की विधि बताते हैं
आबाधाणं बिदियो, तिदियो कमसो हि चरमसमयो दु। पढमो बिदियो तिदियो, कमसो चरिमो णिसेओ दु।।९४१ ।।