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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड- ७८१ द्विचरमादिनिषेकोंका प्रमाण होता है। इसीप्रकार द्वितीयादि गुणहानिके चयका प्रमाण आधा-आधा है अतः प्रचयधन भी आधा-आधा जानना और इनका सर्वधन भी आधा आधा ही है। इसप्रकार अङ्गसन्दृष्टिका कथन किया सो ऐसा ही यथार्थ कथन भी जानना, किन्तु विशेष इतना है कि यहाँ प्रमाण जैसा कहा वैसा ही जानना । यहाँ २८८ को आदि निषेक इस दृष्टि से कहा है कि उसके ऊपर ही चय की वृद्धि होकर आगे के निषेक बनते हैं किन्तु यथार्थ में यह अन्तिम निषेक है। प्रथम निषेक तो ५१२ है। इस प्रकार आगे की गुणहानियों में भी जानना | सव्वासि पयडीणं, णिसेयहारो य एयगुणहाणी । सरिसा हवंति णाणागुणहाणिसलाउ वोच्छामि ।। ९३२ । अर्थ सर्व मूल प्रकृतियोंका निषेकहार दोगुणहानि और एकगुणहानिआयाम ये दोनों तो सम्मान हैं तथा नानागुणहानि शलाकाएँ स्थितिके अनुसार हैं अत: समान नहीं है सो उन नानागुणहानि शलाका ओंको आगे कहते हैं। मिच्छत्तस्स य उत्ता, उवरीदो तिणि तिण्णि संमिलिदा । अगुणेणूणकमा, सत्तसु रइदा तिरिच्छेण ।।९३३ ।। अर्थ - मिथ्यात्वप्रकृतिसम्बन्धी पल्यकी वर्गशलाकाके अर्धच्छेदको आदिकरके पल्यके प्रथममूलके अर्धच्छेदपर्यन्त जो दूने दूने अर्थच्छेद एक-एक वर्ग में कहे गये हैं उनका स्थापन करके उपरितन पल्यके प्रथममूलसे लेकर तीन-तीन वर्गस्थानोंके अर्धच्छेद मिलाने से वे ८-८ गुणे कम अनुक्रमसे होते हैं और उनकी सातस्थानों में पृथक्-पृथक् तिर्यरूप रचना होती है। विशेषार्थ पल्य (६५५३६) के प्रथमवर्गमूल (२५६ ) के अर्धच्छेद ८, पल्य के द्वितीयवर्गमूल (१६) के अर्धच्छेद ४ और पल्यके तृतीयवर्गमूलके अर्धच्छेद २ इन तीनोंको जोड़नेसे अर्धच्छेदोंका प्रमाण १४ होता है । "अंतधणं गुणगुणियं आदिविहीणं रूऊणुत्तरभजियं" इस सूत्र से अन्तधन जो पल्यके अर्धच्छेदोंसे आधे प्रथमवर्गमूलके अर्धच्छेद, उनको गुणकार दोसे गुणा किया तो पल्यके अर्द्धच्छेदका प्रमाण होता है। इसमें से आदिधन पल्यके तृतीयवर्गमूलके अर्धच्छेदको अर्थात् पल्यके अर्धच्छेदोंके आठवें भाग को घटानेसे सातगुणे पल्यके अर्धच्छेदोंका आठवाँ भाग आता है सो इसमें एककम गुणकार दो अर्थात् १का भाग देनेपर उतना ही लब्ध आया, यही उपर्युक्त तीनराशियोंका जोड़ है । १४= पल्यके अर्धच्छेद १६७ अर्थात् = १४ इसीप्रकार चतुर्थ, पंचम व छठे वर्गमूलके अर्धच्छेद कहते हैं ८ पथके चतुर्थ वर्गमूलके अर्धच्छेद = ८ छे १६
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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