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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४१ अब मूल प्रकृति और उत्तरप्रकृतियों में नामादि चारनिक्षेपके भेदों को कहते हैं - मूलुत्तरपयडीणं णामादी एवमेव णवरि तु। सगणामेण य णामं ठवणा दवियं हवे भावो ।।६७ ।। अर्थ - कर्मकी मूलप्रकृति आठ और उत्तर प्रकृति एकसौ अड़तालीस हैं। इन दोनों के नामादि चार निक्षेप हैं। उनका स्वरूप सामान्यकर्म की तरह है, किन्तु विशेषता यह है कि जिस प्रकृति का जो नाम है उसी के अनुसार नाम, स्थापना, द्रव्य और भावनिक्षेप होते हैं। उपर्युक्त कथन में कुछ विशेषता है सो कहते हैं - मूलुत्तरपयडीणं णामादि चउब्विहं हवे सुगमं। वज्जित्ता णोकम्मं णोआगमभावकम्मं च ॥६८॥ अर्थ - मूल तथा उत्तरप्रकृतियों के नामादि चारनिक्षेपों को जानना सुगम है, किन्तु नोकर्मतव्यतिरिक्त तथा नोआगमभावकर्म का स्वरूप समझना कठिन है। विशेषार्थ - पहले द्रव्यनिक्षेप के दो भेद आगम-नोआगमरूप किये। नोआगम के भी ज्ञायकशरीर, भावी और तद्व्यतिरिक्तरूप तीन भेद हैं। तद्व्यतिरिक्त के दो भेद, कर्म और नोकर्मरूप जानना। 'नोकर्मद्रव्यकर्म' इस शब्द से नोकर्मतद्व्यतिरिक्त-नोआगमद्रव्य समझना चाहिए। जो द्रव्यक्षेत्र-काल-भव और भाव जिस प्रकृति के उदयस्वरूप फल में कारणभूत हों वह द्रव्य-क्षेत्र आदि उनउन प्रकृति के नोकर्मद्रव्यकर्म समझना। अब सर्वप्रथम मूलप्रकृतियों के नोकर्म कहते हैं - पड़पडिहारसिमज्जा आहारं देह उच्चणीचंग। भंडारी मूलाणं णोकम्मं दवियकम्मं तु ।।६९ ॥ अर्थ - ज्ञानावरणकर्मका नोकर्मद्रव्य वस्त्र है तथा शेष सातकर्मों के क्रम से प्रतिहार, तलवार, मद्य, आहार, शरीर, ऊँच-नीचशरीर और भण्डारी ये आठ प्रकार जानने। विशेषार्थ - ज्ञानावरण का नोकर्मद्रव्य वस्तु के चारों ओर लगा हुआ वस्त्र है जो वस्तु के ज्ञान को नहीं होने देता। दर्शनावरणकर्म का नोकर्मद्रव्य द्वार पर नियुक्त द्वारपाल है, जो राजा के समान निजात्मरूप आत्मा का अवलोकन नहीं होने देता। अर्थात् अन्तर्मुखचित्प्रकाश को नहीं होने देता। वेदनीयकर्म का नोकर्म शहदलपेटी तलवार है जो वेदनीय कर्मोदय के लिए सुख-दुःख का कारण है।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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