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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ७३५ अथानन्तर उन प्रत्येकपदोंको कहते हैं पत्तेयपदा मिच्छे, पण्णरसा पंच चेव उवजोगा । दाणादी ओदइये, चत्तारि य जीवभावो य ।। ८५७ ।। अर्थ - एकसमयमें युगपत् पाए जायें ऐसे प्रत्येकपद मिथ्यात्वगुणस्थानमें तीन अज्ञान व दो असंयम दर्शन ये पाँच उपयोग, दानादि पाँच क्षायोपशमिकलब्धि, औदयिकभावके मिथ्यात्व, अज्ञान, और असिद्धत्व ये चार तथा जीवत्वरूप पारिणामिकभाव इसप्रकार (५+५+४+१) १५ जानना । पिंडपदा पंचेव य, भव्त्रिददुगं गदी य लिंगं च । कोहादी लेस्सावि य, इदि बीसपदा हु उड्ढे १८५८ ॥ अर्थ - उपर्युक्त १५ प्रत्येकपदोंके आगे मिथ्यात्वगुणस्थानमें पिंडपद पाँच हैं। भव्यत्व - अभव्यत्व. गति, लिंग, क्रोधादि चारकषाय, लेश्या इन पाँच पिण्डपदोंको मिलाकर (१५+५) २० पद होते हैं सो इनको ऊपर-ऊपर स्थापित करना चाहिए। पत्तेयाणं उवरिं, भव्विदरदुगस्स होदि गदिलिंगे । कोहादिलेस्ससम्मत्ताणं रयणा तिरिच्छेण ॥। ८५९ ।। अर्थ – प्रत्येक पदोंके उपर स्थापित किये गये जो भव्य - अभव्यरूप युगल, गति, लिंग, क्रोधादिचारकषाय, लेश्या और सम्यक्त्वकी रचना तिर्यग्रूपसे करना चाहिए। एक्कादी दुगुणकमा, एक्वेक्कं संधिदूण हेम्पि । पदसंजोगे भंगा, गच्छं पडि होंति उवरुवरिं ॥ ८६० ॥ अर्थ - एकसे लेकर दूने दूनेरूप क्रमसे एक-एक पदका आश्रय करके नीचे-नीचे के पदों के संयोगसे गच्छजितनेवाँ पद होवे उतने प्रमाणरूप ऊपर-ऊपरके भंग होते हैं। विशेषार्थ - मिथ्यात्वगुणस्थानमें सबसे नीचे कुमतिरूप प्रत्येकपदका स्थापन किया सो इसमें प्रत्येकभंग एक ही है, उसके ऊपर स्थापित कुश्रुतमें प्रत्येकभंग एक है तथा अधस्तनवर्ती कुमति के संयोगसे द्विसंयोगीभंग एक ऐसे दोभंग हुए। इसके ऊपर स्थापित विभवज्ञानमें भी प्रत्येकभंग तो एक ही है तथा अधस्तनवर्ती कुश्रुत व कुमतिज्ञानके संयोगसे द्विसंयोगीभंग दो और तीनोंके संयोगसे त्रिसंयोगीभंग एक, इसप्रकार ४ भङ्ग हुए। विभन्नज्ञान के ऊपर स्थापित चक्षुदर्शनमें प्रत्येकभंग एक तथा अधस्तनवर्ती विभङ्ग-कुश्रुत व कुमतिज्ञानके संयोग से द्विसंयोगीभंग ३, चक्षुदर्शन- कुमति-कुश्रुत या चक्षुदर्शन कुमति
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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