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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७३० अडदालं छत्तीसं, जिणेसु सिद्धेसु होंति णव भंगा। एत्तो सव्वपदं पडि, मिच्छादिसु सुणह वोच्छामि ॥८५५॥ अर्थ- जिनको गुणा जावे ऐसे गुण्य मिथ्यात्वगुणस्थानमें ८, सासादनादि तीनगुणस्थानोंमें - ७, देशसंयतादि तीन गुणस्थानों में ६-६, उपशमक-क्षपक अपूर्वकरणमें ६, अनिवृत्तिकरणमें ६ व ५, सूक्ष्मसापरायमें ५, उपशांतकषाय व क्षीणकपायमें चार, सयोगकेवलीके ३, अयोगकेवलीके २ तथा सिद्धोंमें शून्य जानना तथा जिनसे गुगुणा किया जावे गुणकार मिथ्यात्वगुणस्थानमें १२, सासादन व मिश्रमें ८-८, असंयतगुणस्थानमें २६, देशसंयतादितीनगुणस्थानोंमें ३२-३२, उपशमक अपूर्वकरणादि चारगुणस्थानोंमें ४०-४०, क्षपक अपूर्वकरणादि तीनगुणस्थानों में २४-२४, क्षीणकपायगुणस्थानमें २४, सयोगी व अयोगीगुणस्थानमें १२-१२ तथा सिद्धोंमें गुणकारका अभाव है और जिनको मिलाया जावे ऐसे क्षेप मिथ्यात्वगुणस्थानमें १४, सासादन व मिश्रगुणस्थानमें १०-१०, असंयतगुणस्थानमें २८, देशसंयतमें ३४, प्रमत्त व अप्रमत्नमें भी ३४-३४, उपशमक अपूर्वकरणादि चार गुणस्थानोंमें ४२-४२, क्षपक अपूर्वकरणादि तीनगुणानामें २६-२६: सीणगाना में २६, श्योगी अयोगीमें १२-१२ और सिद्धोंमें ९ जानना ॥८४९-५०-५१ ।। ___ इसप्रकार उपर्युक्त गुण्यको गुणकारसे गुणाकरके क्षेपराशि जोड़नेपर जो भंग हुए वे मिथ्यात्वगुणस्थानमें ११०, सासादन व मिश्रमें ६६-६६, असंयतमें २१०, देशसंयतादि तीनगुणस्थानोंमें २२६-२२६, उपशमक अपूर्वकरणसे अनिवृत्तिकरणके सवेदभागपर्यन्त २८२-२८२ आगे उपशमक अनिवृत्तिकरणके अवेदभागसे सूक्ष्मसाम्परायपर्यंत २४२-२४२, उपशान्तकषायमें २०२ भंग हैं। क्षपक श्रेणीकी अपेक्षा कमसे अपूर्वकरण व सवेदअनिवृत्तिकरणगुणस्थानमें १७०-१७०, अवेदअनिवृत्तिकरणसे सूक्ष्मसाम्परायपर्यन्त १४६-१४६, क्षीणकपायगुणस्थानमें १२२, सयोगकेवलीके ४८, अयोगकेवलीके ३६ और सिद्धोंके ९ भंग हैं। इसप्रकार जातिपदभंगोंका कथनकरके सर्वपदभंगोंका कथन आगे करेंगे ऐसा जानना ।।८५२-५३-५४-५५ ।। विशेषार्थ – मिथ्यात्वगुणस्थानमें क्षायोपशमिकभावके अज्ञान-दर्शन व लब्धि ये तीन, औदयिकभावके आठ और पारिणामिकभावके भव्य-अभव्यरूप दो जातिपद हैं। यहाँ औदयिकभावके ८ जातिपद तो गुण्यरूप जानना तथा प्रत्येकभंगमें औदयिकभावोंके आठका समूहरूप एक तो गुणकार और क्षायोपशमिकभावके तीन तथा पारिणामिकभाव के दो ये पाँच जातिपद क्षेपरूप जानना। द्विसंयोगीभगमें औदयिकभावके आठका समूहरूप एक, क्षायोपशमिकभावोंके तीन तथा पारिणामिकभावोंके दो ये ६ गुणकाररूप और क्षायोपशमिकभावके तीनके संयोगसहित पारिणामिकभावके दो भेदरूप (३४२) ६ क्षेपरूप जानना। त्रिसंयोगीभंगोंमें औदयिकभावोंके आठका समूहरूप एक, अभव्यरूप पारिणामिकभावके संयोगसहित क्षायोपशमिकभावके तीन और औदयिकभावके आठका समूहरूप एक,
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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