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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-७२९
औपशमिक क्षायिक क्षायोपशमिक
सभ्वाक्चाकरित्र ....
जाहिपहप झर्व कितने हैं, ज्ञान-दर्शन-लब्धि-सम्य, और चा. | यह जाननेके लिए यह सन्दृष्टि ज्ञान, अज्ञान, दर्शन, लब्धि, बनायी है, किन्तु गुणस्थानोंमें सम्यक्त्व, देशसंयम, सरागचारित्र । ये जातिपदरूप भाव कहाँ-कहाँ
पाये जाते हैं इसे उपर्युक्त सन्दृष्टि
में बताया गया है। गति, कषाय, लिङ्ग, मिथ्यात्व, अज्ञान, असंयम, असिद्धत्व और लेश्या ।
औदयिक
पारिणामिक
भव्यत्व, अभव्यत्व और जीवत्व आगे गुण्य-गुणकार व क्षेप तथा इन तीनोंकी अपेक्षा होनेवाले भङ्गों को ७ गाथाओं में कहते हैं
अट्ट गुणिज्जा वामे, तिसु सग छच्चदुसु छक्क पणगं च । थूले सुहुमे पणगं, दुसु चदुतियद्गमदो सुण्णं ।।८४९॥ बारहट्टछवीसं तिसु तिसु बत्तीसयं च चदुवीसं । तो तालं चदुवीसं, गुणगारा बार बार णभं ॥८५० ।। वामे चदुदस दुसु दस, अडवीसं तिसु हवंति चोत्तीसं। तिसु छब्बीस दुदालं, खेवा छब्बीस बार बार णवं ।।८५१ ॥ एक्कारं दसगुणिदं, दुसु छावट्ठी दसाहियं बिसदं। तिसु छब्बीस बिसदं, वेदुवसामोत्ति दुसय बासीदि॥८५२ ।। बादालं बेण्णिसया, तत्तो सुहुमोत्ति दुसय दोसहिदं । उवसंतम्मि य भंगा, खवगेसु जहाकम वोच्छ ।।८५३ ॥ सत्तरसं दसगुणिदं, वेदित्ति सयाहियं तु छादालं । सुहुमोत्ति खीणमोहे, बावीससयं हवे भंगा ।।८५४॥