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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड- ७२२ स्थानके साथ पारिणामिकभावके दो भन हैं। इसप्रकार सर्व मिलकर ( प्रत्येक भङ्ग १, द्विसंयोगीके ४ भंग और त्रिसंयोगी भङ्ग ४) ९ भक्त गुणकाररूप तथा प्रत्येक भंग ४ और द्विसंयोगीभंग ४ ये मिलकर ८ भंग क्षेपरूप हैं। पहले औदयिकभावके भंगोंसे मिथ्यात्वगुणस्थानमें २०४ भंगरूप गुण्य कहे थे उनको गुणकार ९ से गुणाकरनेपर (२०४४९) १८३६ हुए, इनमें क्षेपरूप ८ भंग मिलानेसे (१८३६+८) १८४४ भंग होते हैं। चक्षुदर्शनरहित मिध्यात्वगुणस्थानमें क्षायोपशमिकके ८ भावरूप एकस्थान, औदयिकके ८ भावरूप एकस्थान तथा पारिणामिकके भव्य व अभव्यरूप दोस्थान इसप्रकार सर्व ४ स्थान हैं। यहाँ प्रत्येकभंग चार हैं उनमें से क्षायोपशमिकका ८ भावरूप एकस्थान ही ग्रहण करना, क्योंकि शेष ३ प्रत्येकभंग पुनरुक्त हैं। चक्षुदर्शनरहित मिथ्यात्वगुणस्थानमें पूर्वमें जो भंग कहे थे वे ही हैं अतः एक ही ग्रहण किया है सो वह क्षेपरूप है। द्विसंयोगी भंगोंमें क्षायोपशमिकके ८ भावरूप एकस्थान और औदयिकके ८ भावरूपस्थानके संयोगरूप एकभंग गुणकाररूप है। औदयिकके स्थान और पारिणामिक भव्य - अभव्यत्वरूप स्थानके संयोगसे जो द्विसंयोगीभंग होते हैं वे पुनरुक्त हैं अतः ग्रहण नहीं किये तथा क्षायोपशमिकके ८ भावरूप एकस्थान और पारिणामिकके भव्य - अभव्यरूप दो स्थानोंके संयोगसे द्विसंयोगी जो दोभंग होते हैं वे क्षेपरूप जानना । त्रिसंयोगी भंगोंमें क्षायोपशमिक ८ भावरूपस्थान, औदयिकके ८ भावरूप स्थानके भव्य - अभव्यरूप दोस्थानोंके संयोगसे दोभंग हुए वे गुणकाररूप हैं। इसप्रकार चक्षुदर्शन रहित मिध्यादृष्टिके पूर्वमें जो १२ भंग गुण्यरूप कहे थे उनके मिलकर ३ गुणकाररूप और ३ क्षेपरूप भंग हैं। गुण्यको गुणकारसे गुणाकरके क्षेपको मिलानेसे (१२ ३+३) ३९ भंग होते हैं । इसप्रकार चक्षुदर्शनसहित व रहित मिथ्यादृष्टिके सर्व भङ्ग मिलानेपर (१८४४+३९) १८८३ भंग जानना | इसीप्रकार सासादनगुणस्थानमें भी भावोंके जितने स्थान पाए जाते हैं उतने तो प्रत्येक भंग जानना । औदयिकभावका जो स्थान है वह तो गुणकार और जो अन्य भावोंके स्थान हैं वे क्षेपरूप जानना तथा दो व तीन आदि भावोंके संयोगसे होते हैं वे द्विसंयोगी त्रिसंयोगी आदि भंग जानना । यहाँ औदयिकभाव और अन्य किसी भावके संयोगसे जो द्विसंयोगी आदि भन्न होते हैं वे तो गुणकाररूप हैं और औदयिकभावबिना अन्य भावके संयोगसे जो द्विसंयोगी आदि भन्न होते हैं वे क्षेपरूप जानना । जिन भङ्गों को पहले कह आये हैं पश्चात् भी उन्हींके समान जो भङ्ग हैं वे पुनरुक्त हैं अत: उनका ग्रहण नहीं करना चाहिए। इसप्रकार उपर्युक्त सर्व (सासादनगुणस्थानसम्बन्धी ) गुणकार भोंको जोड़नेपर जो प्रमाण हो उससे पूर्वमें जो गुण्यरूप भंग कह आये हैं उसमें गुणाकरके लब्धराशिमें क्षेपरूप भङ्गोंको जोड़ने से जोजो राशि प्राप्त होती जावे उन सभी का जोड़ कर देनेपर भंगोंका प्रमाण होता है भङ्ग प्राप्त करनेका यह नियम सभी गुणस्थानोंमें जानना । अतः सासादनगुणस्थानमें क्षायोपशमिकभावके १० व ९ भेदरूप दो स्थान हैं, औदयिकका ७ भावरूप एकस्थान और पारिणामिकका भव्यत्वरूप एकस्थान ऐसे चारस्थानोंके प्रत्येकभंगोंमें गुणकार एक, क्षेप ३; द्विसंयोगीभङ्गों में गुणकार ३ व क्षेप २; त्रिसंयोगी भंगों में गुणकार २
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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