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________________ ___ . गोम्मटमार कर्मकाण्ड-३७.... ____ अर्थ - नोआगमद्रव्यकर्म के तीन भेद हैं - ज्ञायकशरीर, भावी और तद्व्यतिरिक्त। इनमें भी ज्ञायकशरीर के तीन भेद हैं - भूत, भावी और वर्तमान । इनमें दो तो सुगम हैं। विशेषार्थ - कर्मस्वरूप को जाननेवाले जीवका शरीर ज्ञायकशरीरनोआगमद्रव्यकर्म है। इसके तीन भेद हैं - भूत-वर्तमान और भावी। जिसशरीर सहित जीव कर्मस्वरूप का वर्तमान में ज्ञाता है, वह वर्तमानशरीर है। यह पहले जिस शरीर को छोड़कर आया है वह भूतशरीर और आगे जो शरीर धारण करेगा वह भावी शरीर है। राजपर्याय का आधार होने से अनागत और अतीत जीव में भी जिसप्रकार राजारूप व्यवहार की उपलब्धि होती है, उसी प्रकार कर्मपर्याय से परिणत जीव का आधार होने से अतीत और अनागतशरीर में भी कर्मरूप व्यवहार हो सकता है।' अथानन्तर ज्ञायकभूतशरीर के भेद कहते हैं - भूदं तु चुदं चइदं चदंति तेधा चुदं सपाकेण । पडिदं कदलीघादपरिच्चागेणूणयं होदि ॥५६॥ अर्थ - ज्ञायकभूतशरीर के तीन भेद हैं - च्युत, च्यावित और त्यक्त। इनमें अन्य कारण के बिना स्वयं आयु पूर्ण होने से जो शरीर छूटता है उसे च्युत कहते हैं, यह कदलीघात तथा संन्यास से रहित है। कदलीघात का लक्षण - विसवेयणरत्तक्खय भयसत्थग्गहणसंकिलेसेहिं । उस्सासाहाराणं णिरोहदो छिज्जदे आऊ ॥५७।। अर्थ - विष खाने से, वेदना से, रक्त के क्षय हो जाने से, भय से, शस्वघात से, संक्लेश से, घास के रुक जाने से, आहार के न मिलने आदि से आयु का क्षय हो जाता है, उसे कदलीघात (अकालमरण) कहते हैं। १. इसका विशेष कथन ध. पु. १ पृ. २२ से २६ तक देखें। २. ध. पु. १ पृ. २३, भावपाहुड़ गाथा २५। । ३. राजा श्रेणिक को क्षायिक-सम्यग्दर्शन उत्पन्न हो गया था और सम्यग्दृष्टि के नरकायु का बंध नहीं हो सकता, क्योंकि नरकायु की बंध-व्युच्छित्ति प्रथम गुणस्थान में हो जाती है। अत: राजा श्रेणिक के नरकायु का बंध सम्यक्वोत्पत्ति से पूर्व हो चुका था। राजा श्रेणिक का अकालमरण नहीं हुआ है, क्योंकि परभव की आयु बंध होने के पश्चात् अकालमरण नहीं होता है। कहा भी है - पर-भवियआउए बद्धे पच्छा भुंजमाणाउअस्स कदलीघादो णत्थि जहासरूवेण चेव वेदेदित्ति । (ध.१०/२३७) परभव सम्बन्धी आयु के बँधने के पश्चात् भुज्यमान आयु का कदलीघात नहीं होता, किन्तु वह जितनी थी उतनी काही वेदन करता है।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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