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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३६
ऐसी संज्ञा करने को नामकर्म कहते हैं। नामनिक्षेप के जाति-द्रव्य-गुण और क्रिया, ये चार अन्य निमित्त कहे हैं। गौ, मनुष्य आदि जाति-निनित्तक नाम हैं। दण्डी, छत्री, मौली आदि संयोगद्रव्यनिमित्तक नाम हैं अथवा काना, कुबड़ा इत्यादि समवायद्रव्यनिमित्तक नाम हैं। कृष्ण, रुधिर आदि गुणनिमित्तक नाम तथा गायक, नर्तक आदि क्रियानिमित्तक नाम हैं। इस तरह जाति आदि इन ४ निमित्तों को छोड़ कर संज्ञा की प्रवृत्ति में अन्य दूसरा कोई निमित्त नहीं है। वाच्यार्थ की अपेक्षारहित “कर्म शब्द" नामकर्म
स्थापना रूप कर्म को कहते हैं -
सरिसासरिसे दव्वे मदिणा जीवट्ठियं खुजं कम्मं ।
तं एदंति पदिट्ठा ठवणा तं ठावणा कम्मं ॥५३ ।। अर्थ - सदृश अथवा विसदृश वस्तु में अपनी बुद्धि से स्थापना द्वारा जीव के समस्त प्रदेशों! में स्थित जो सामान्यकर्म है 'वह यह हैं ऐसी प्रतिष्ठा करना स्थापनाकर्म है।
विशेषार्थ - स्थापनानिक्षेप दो प्रकार का है, सद्भावस्थापना और असद्भावस्थापना। इन दोनों में, जिस वस्तु की स्थापना की जाती है उसके आकार को धारण करनेवाली वस्तु में सद्भावस्थापना समझना चाहिए तथा जिसवस्तु की स्थापना की जाती है उसके आकारसे रहित वस्तुमें असद्भाव स्थापना जानना चाहिए। आगे द्रव्यनिक्षेपरूप कर्मका स्वरूप कहते हैं -
दव्वे कम्मं दुविहं आगमणोआगमंति तप्पढम।
कम्मागमपरिजाणुगजीवो उवजोग परिहीणो॥५४॥ अर्थ - द्रव्यनिक्षेपकर्म के आगमद्रव्यकर्म और नोआगमद्रव्यकर्म की अपेक्षा दोभेद हैं। जो कर्मरूपशास्त्र को जाननेवाला तो है, किन्तु वर्तमान में उस शास्त्र में उपयोग नहीं रखता है वह जीव आगमद्रव्यकर्मनिक्षेप है। अथानन्तर नोआगमद्रव्यनिक्षेप द्वारा कर्म को कहते हैं -
जाणुगसरीर भवियं तव्वदिरित्तं तु होदि जं विदियं । तत्थ सरीरं तिविहं तियकालगयंति दो सुगमा ॥५५॥
१.
घ. पु. १ पृ. १७|
२.ध.पु. १ पृ. २०।