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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ६७० ये २० बन्धप्रत्यय हैं तथा केवलज्ञानी व केवलदर्शनी जीवोंमें आदि व अन्तिम मनोयोग और वचनयोग ( सत्य - अनुभव मन व वचनयोग), औदारिक- औदारिकमिश्र व कार्मणकाययोग इसप्रकार ( २+२+३} ७ योगरूप बन्धप्रत्यय हैं। आगे संयममार्गणासम्बन्धी बन्धप्रत्यय कहते हैं संजलण णोकसाया मण वचि ओराल आहारदुगं ॥ ९ ॥ - सामाइय छेएसुं आहारदुगूणया दु परिहारे । मण - वचि - अट्ठारालं सुहुमे संजलण लोहंते ॥ १० ॥ कम्मोरालदुगाई मणवचि चउरा य होंति जहखाए । असंजमम्मि सव्वे आहारदुगूणया णेया ॥ ११ ॥ अणमिच्छ बिदिय तसवह वेउव्वाहार जुयलाई । ओराल मिस्सकम्मा तेहिं विहीणा दु होंति देसम्मि ॥ १२ ॥ अर्थ - सामायिक-छेदोपस्थापना संयमीजीवोंमें चार सञ्ज्वलनकषाय, ९ नोकषाय, ४ मनोयोग, ४ वचनयोग, औदारिककाययोग, आहारक व आहारकमिश्रकाययोग ये (४+१+४+४+३) २४ बन्धप्रत्यय हैं। आहारक-आहारकमिश्रकाययोगबिना शेष (२४- २) २२ प्रत्यय परिहारविशुद्धिसंयमीके होते हैं। सूक्ष्मसाम्परायसंयममें मनोयोग ४, वचनयोग ४, सञ्ज्वलनसूक्ष्मलोभ, औदारिककाययोग (४+४+१+१) ये १० बन्धप्रत्यय हैं; यथायातसंयममें मनोयोग ४, वचनयोग ४, औदारिक- औदारिकमिश्र व कार्मणकाययोग ( ४+४+३ ) ये १९ बन्धप्रत्यय होते हैं। असंयमी जीवों में आहारक व आहारकमिश्रकाययोगविना (५७ - २) ५५ प्रत्यय होते हैं; देशसंयमीजीवोंमें (अनन्तानुबन्धीकषाय ४, मिथ्यात्व ५ त्रस अविरति, वैक्रियिक-वैक्रियिकमिश्र, आहारक व आहारकमिश्र, औदारिकमिश्र और कार्मणकाययोग, अप्रत्याख्यानकषाय ४ इन) २० के बिना शेष (५७-२०) ३७ बन्धप्रत्यय हैं। अब लेश्या भव्य एवं दर्शनमार्गणामे बन्धप्रत्यय कहते हैं तेज-तिय चक्खुजुगले सव्वे हेऊ हवंति भव्वे य । किण्हादितियाऽभव्वे आहारदुगूणया णेया ॥ १३ ॥ अर्थ - तेज त्रिक ( पीत - पद्म शुक्ल) लेश्यामें सभी (५७) प्रत्यय हैं, कृष्ण आदि तीन अशुभलेश्या ( कृष्ण-नील - कपोत) में आहारक आहारकमिश्रकाययोगबिना (५७-२) ५५ प्रत्यय हैं।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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