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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६६१
अथ बन्धप्रत्यय अधिकार
आगे प्रत्यय अर्थात् कर्मबन्धके कारणभूत अधिकारको कहनेकी प्रतिज्ञा करते हुए निर्विघ्नपरिसमाप्तिके लिए आचार्य अपने इष्टगुरुको नमस्कार करते हैं
णमिऊण अभयणंदि सुदसायरपारगिंदणंदिगुरुं।
वरवीरणंदिणाहं पयडीणं पच्चयं वोच्छं ॥७८५।। अर्थ - मैं (नेमिचन्द्राचार्य) अभयनान्द मुनीश्वर को; शास्त्रतपुरका पारगामी इन्द्रमन्दि गुरु को तथा उत्कृष्ट वीरनन्दिस्वामि को जो कि मेरे गुरु हैं, उनको नमस्कार करके कर्मप्रकृतियों के प्रत्यय अर्थात् बन्धकारणों को कहूंगा। अब प्रत्यय के भेदों का कथन करते हैं
मिच्छत्तं अविरमणं कसायजोगा य आसवा होति ।
पण बारस पणुवीसं पण्णरसा होति तब्भेया॥७८६॥' अर्थ -- मिथ्यात्व-अविरति-कषाय और योग, ये चार मूल (प्रत्यय) आस्रव हैं (क्योंकि इनके द्वारा कार्माण स्कंध कर्मरूपता को प्राप्त होते हैं) तथा इनके उत्तरभेद क्रमसे ५-१२-२५ और १५ जानने। इसप्रकार आस्रवों के उत्तरभेद ५७ हैं।
विशेषार्थ – “प्रत्ययशब्दोऽनेकार्थः। क्वचिज्ज्ञाने वर्तते, यथा अर्थाभिधान प्रत्यया इति । क्वचिच्छपथे वर्तते, यथा परद्रव्यहरणादिषु सत्युपालम्भे प्रत्ययोऽनेन कृत इति । क्वचिद्धेतो वर्तते यथा अविद्याप्रत्ययाः संस्कारा इतिः।" प्रत्ययशब्दके अनेक अर्थ हैं। कहीं पर ज्ञानके अर्थमें वर्तता है जैसे अर्थ, शब्द, प्रत्यय (ज्ञान)। कहीं पर शपथके अर्थमें वर्तता है। जैसे- परद्रव्यके चुराये जाने के प्रसंगमें दूसरोंके द्वारा उलाहना मिलने पर उसके द्वारा शपथ खाई गई। कहींपर हेतुके अर्थमें वर्तता है, जैसेअविद्या के हेतु संस्कार हैं। यहाँ पर प्रत्यय शब्दका हेतुके अर्थमें प्रयोग हुआ है। (रा.वा.१/२१) "पच्चओ कारणं णिमित्तमिच्चणत्वंतरं" (ध. पु. १२ पृ. २७६) प्रत्ययका अर्थ आस्रव नहीं हो सकता, क्योंकि आस्रव का लक्षण भिन्न है जो इसप्रकार है- “पुण्यपापलक्षणस्य कर्मण आगमनद्वारमास्रव इत्युच्यते । आस्रव इवासवः। क उपमार्थ : ? यथा महोदधे: १. प्रा.पं.सं.पृ. १०५ गाथा ७७ ।