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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६३५ जानना | वंशा, मेघा आदि नरकों में अति अवस्थामें असंवत गुंगल्यान नहीं होता क्योंकि शरीरपर्याप्ति होनेपर ही वहाँ पर सम्यक्त्व उत्पन्न होता है। नारकियोंके अपर्याप्तकालमें अन्य गुणस्थान ( सासादन, मिश्र) नहीं हैं। एकेन्द्रियजीवोंके परघातयुत २५ प्रकृतिक उदयमें २३-२५-२६- २९ व ३० प्रकृतिक बन्धसहित सत्त्व ९२-९०-८८-८४ व ८२ प्रकृतिका है। त्रसतिर्यञ्चजीर्वोके २५ प्रकृतिक उदय नहीं है क्योंकि इनके अनोपान व संहननसहित २६ प्रकृतिका ही उदय पाया जाता है तथा प्रमत्तगुणस्थानवर्ती मनुष्य आहारकशरीरमें संहनन नहीं अतः अङ्गोपालसहित २५ प्रकृतिका उदय है सो इनके देवयुत २८ और देवगति व तीर्थङ्करसहित २९ प्रकृतिक बन्धसहित ९३ ९२ प्रकृतिका सत्त्व है। देवोंके २५ प्रकृतिक उदय है जिसप्रकार २१ प्रकृतिक उदयमें बन्ध-सत्त्वका कथन किया गया है उसीप्रकार यहाँ भी बन्ध और सत्त्व जानना चाहिए । २६ प्रकृतिक उदय लब्ध्यपर्याप्त व निर्वृत्त्यपर्याप्त त्रसतिर्यञ्चोंके संहननसहित है यहां मिथ्यात्वगुणस्थानमें २६ प्रकृतिक उदयमें २३-२५-२६-२९ व ३० प्रकृतिके बन्धसहित सत्त्वस्थान ९२ और ९०-८८-८४ व ८२ प्रकृतिक चार हैं। एकेन्द्रिय मिथ्यादृष्टिके शरीरपर्याप्तिमें उद्योत या आतप सहित २६, अथवा उच्छ्वास पर्याप्ति से पर्याप्तजीवके उच्छ्वास सहित (तथा आतप उद्योत रहित) २६ प्रकृतिक उदयमें २३ २५ २६ २९ व ३० प्रकृतिक बन्धसहित ९२-९०-८८-८४ व ८२ प्रकृतिका सत्त्व है, सासादनगुणस्थान में २६ प्रकृतिरूप उदय नहीं हैं, क्योंकि इसस्थानके उदयसे पूर्व ही २४ प्रकृतिक स्थानमें सासादनकाल समाप्त हो जाता है तथा पञ्चेन्द्रियतिर्यञ्चके सासादनगुणस्थानमें २६ प्रकृतिक उदय है तब २९ ३० प्रकृतिके बन्धसहित ९० प्रकृतिका सत्त्व है। "मिच्छदुगे देवचऊण" इस वचनसे २८ प्रकृतिका बन्ध नहीं है, मिश्रगुणस्थानमें २६ प्रकृतिक उदय नहीं है, असंयतगुणस्थानमें २६ प्रकृतिक उदयमें देवगतियुत २८ प्रकृतिक बन्धसहित ९२ व ९० प्रकृतिका सत्त्व है, देशसंयतगुणस्थान में २६ प्रकृतिका उदय नहीं है। मनुष्यके २६ प्रकृतिका उदय होता है यहाँ मिथ्यात्वगुणस्थानमें २३-२५२६-२९ व ३० प्रकृतिक बन्धसहित सत्त्व ९२-९०-८८ व ८४ प्रकृतिका सव है, सासादनगुणस्थान में तिर्यञ्च या मनुष्यगतियुत २९ और तिर्यञ्च - उद्योतसहित ३० प्रकृतिक बन्धसहित ९० प्रकृतिका सत्त्व है, मिश्रगुणस्थान में इस प्रकारका उदय नहीं है, असंयतगुणस्थानमें देवगतियुत २८ व देवगति व तीर्थङ्करयुत २९ प्रकृतिका बन्ध होता है एवं ९३-९२-९९ व ९० प्रकृतिक सत्त्वस्थान हैं, देशसंयतादि गुणस्थानों में यह उदयस्थान नहीं है, तीर्थङ्गरबिना सामान्य केवलीके कपाटसमुद्घातमें २६ प्रकृतिके उदयमें बन्ध नहीं है, किन्तु सत्त्व ७९ व ७७ प्रकृतिका है। २७ प्रकृतिका उदय तीनगतिसम्बन्धी शरीरपर्याप्तिमें तथा तिर्यञ्चगतिमें एकेन्द्रियके उच्छ्वासपर्याप्तिकालमें होता है। जहाँ २७ प्रकृति का उदय होता है वहाँ घर्मादि तीन नरकों के मिथ्यात्वगुणस्थान में बन्ध तिर्यञ्च या मनुष्यगतिसहित २९ का एवं तिर्यञ्च - उद्योतयुत ३० प्रकृतिका तथा सत्त्व ९२ ९० प्रकृतिका है, यहाँ तीर्थंकर सहित सत्त्वस्थान सम्भव नहीं है, क्योंकि शरीर पर्याप्ति के उपर तीर्थङ्कर सत्त्वसहित नारकी मिथ्यादृष्टि के सम्यक्त्व उत्पन्न हो जाता है। सासादनादिगुणस्थानोंमें
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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