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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६२७
प्रकृतिका उदय और ९२ व ९० प्रकृतिका सत्त्व होता है। अप्रमत्तगुणस्थानमें देवयुत २८ प्रकृतिक बन्ध होनेपर उदय ३० एवं सत्त्व ९२ व ९० प्रकृतिका है, किन्तु २५-२७ व २९ प्रकृतिक उदयमें सत्त्व ९२ प्रकृतिका ही है। अपूर्वकरणगुणस्थानमें देवयुत २८ प्रकृतिका बन्ध होते हुए उदय एवं सत्त्व क्रमश: ३० और ९२ व ९० प्रकृतिका जानना।
२८ प्रकृतिक बथान उदय व सन्चस्थानों के कथनमें यहापि विशेषकथन गर्भित हो जाता है, किन्तु प्राकृतपंचसंग्रहकार ने पृ. ३९३ मा, २२६ से पृ. ३७७ गा. २३३ तक २८ प्रकृतिक बन्धस्थानमें उदय तथा सत्त्वकी विशिष्टदशामें स्थानविशेषोंका कथन किया है जो इसप्रकार है(१) २८ प्रकृतिका बन्ध करनेवाला क्षायिकसम्यग्दृष्टि मनुष्य मरकर भोगभूमिजोंमें उत्पन्न होनेवालेके
२१ व २६ प्रकृतिके उदयमें भी २८ प्रकृतिका बन्ध और सत्त्व ९२ या ९० प्रकृतिका होता है। (२) छठे प्रमत्तसंयत गुणस्थानमें आहारकशरीरमिश्रकालमें २५ प्रकृतिका उदय होनेपर तथा
आहारकशरीरपर्याप्तिकालमें २७ प्रकृतिका उदय होनेपर २८ प्रकृतिक स्थानका बन्ध होता है, किन्तु सत्त्व ९२ प्रकृतिका ही है। आहारकप्रकृतिके सत्त्ववाले असंयतसम्यग्दृष्टिके २९ प्रकृतिका उदय और प्रमत्तसंयतके २८ प्रकृतिके उदयस्थानमें बन्ध २८ प्रकृति का और सत्त्व ९२ प्रकृति का है। मिथ्यात्वगुणस्थानसे विरताविरत नामक पंचमगुणस्थानतकके जीवोंके ३० प्रकृति के उदयस्थानमें
और २८ प्रकृतिके बन्धस्थानमें सत्त्व ९२ व ९० प्रकृतिका होता है। जिसने पहले सरकायुका बन्ध कर लिया हो ऐसा कर्मभूमिज मनुष्य उपशम या वेदकसम्यक्त्वको प्राप्तकर केवलिके पादमूलमें तीर्थङ्करप्रकृतिका बन्धकर दूसरे या तीसरे नरकमें जानेके अभिमुख मिथ्यात्वको प्राप्त हो नरकगतियुत २८ प्रकृति का बन्ध करता है उससमय ३० प्रकृति का उदय
और ९१ प्रकृति का सत्त्व। देवद्विककी उद्वेलना करके मिथ्यादृष्टि पंचेन्द्रिय तिर्यञ्च या मनुष्यमें उत्पन्न होकर नरकगतियुत २८ प्रकृतिका बन्ध करनेवालेके उदय ३० प्रकृति का और सत्त्व ८८ प्रकृति का। ३१ प्रकृतिके उदयवाला मिध्यादृष्टिसे विरताविरत पंचमगुणस्थान तक पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चके
नरकगतियुत २८ प्रकृतिका बन्ध होनेपर सत्त्व ९२ व ९० प्रकृतिका। (८) मिथ्यादृष्टि पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चके नरकगतियुत २८ प्रकृतिका बन्ध, उदय ३१ प्रकृतिका और सत्त्व
८८ प्रकृतिका, क्योंकि देवद्रिक की उद्वेलना वाला है।