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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६१८ अब दर्शनमार्गणा में बन्ध-उदय और सत्त्वस्थानों का कथन करते हैं पुरिसं का चरिखद अस्थि संचपखुम्मि चाउदीसं ॥७२९।। ओहिदुगे बंधतियं तण्णाणं वा किलिट्ठलेस्सतिए। अर्थ – दर्शनमार्गणाके चक्षु-अचक्षुदर्शनमें बन्धस्थान-उदयस्थान एवं सत्त्वस्थान पुरुषवेदवत् ही हैं, किन्तु विशेषता यह है कि अचक्षुदर्शनमें २४ प्रकृति का उदयस्थान भी पाया जाता है। अवधिदर्शन और केवलदर्शनमें बन्ध-उदय -सत्त्वस्थान अवधि व केवलज्ञानवत् जानना चाहिए। ("किलिट्ठलेस्सतिए' इन वचनोंमें कृष्णादि तीन लेश्यासम्बन्धी जो कथन किया है उसे लेश्यामार्गणामें कहा गया है।) दर्शनमार्गणा में बन्ध-उदय-सत्त्वस्थानसम्बन्धी सन्दृष्टिदर्शन- बन्ध- बन्धस्थानगत उदय- उदयस्थानगत - सत्त्व- | सत्त्वस्थानगत प्रकृतिमार्गणा स्थान | प्रकृति-संख्या स्थान | प्रकृति संख्या का | स्थान | संख्या का विवरण संख्या का विवरण संख्या विवरण संख्या चक्षुदर्शन | ८ |२३-२५-२६-२८-८ , २१-२५-२६- ११ ९३-१२-९१-९०२९-३०-३१ व १ । २७-२८-२९ ८८-८४-८२-८० ७१-७८ व ७७ प्रकृतिक अचक्षुदर्शन | ८ |२३-२५-२६-२८-९ २१-२४-२५-२६- ११ २७-२८-२९ ३० व ३१ अवधिदर्शन | ५ |२८-२९-३०-३१ / ८ २१-२५-२६-२७-८ ९३-९२-९१-१० व १ प्रकृतिक | २८-२९-३० व ३१|| ८०-७९-७८ व ७७ केवलदर्शन | . . | २०-२१-२६-२७-| |८०-७१-७८ व ७७ १२८-२९-३०-३१ तथा १० व २ ९ व ८प्रकृतिक अथानन्तर लेश्यामार्गणा में बन्ध-उदय एवं सत्त्वस्थान का कथन करते हैं ..किलिट्ठलेस्सतिये। अविरमणं वा सुहुजुगलुदओ पुंवेदयं व हवे ॥७३० ।।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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