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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ६०५ उदओ तीसं सत्तं पदमचउक्कं च सीदिचउ संते । खीणे उदओ तीसं पढमचउ सीदिचउ सत्तं ।। ७०२ ।। जोगिम्मि अजोगिम्मि य तीसिगितीसं णवट्ठयं उदओ । सीदादिचऊछक्कं कमी सप्तं समुद्दि ॥ ७०३ ॥ कुलयं ॥ अर्थ - नामकर्मके बन्ध-उदय व सत्त्वस्थान जो गाथा ३९४-९५ में गुणस्थानोंकी अपेक्षा क गए हैं उन सभीको अर्थकी युक्तिसे यहाँ पृथक्-पृथक् कहते हैं। मिथ्यात्वगुणस्थानमें २३ प्रकृतिक स्थानको आदिकरके ६ बन्धस्थान, २१ आदि प्रकृतिरूप ९ उदयस्थान तथा ९२ आदि प्रकृतिरूप ६ सत्त्वस्थान हैं। सासादनगुणस्थानमें २८ आदि प्रकृतिरूप ३ बन्धस्थान, २१ प्रकृतिकस्थानसे ३१ प्रकृतिक स्थानपर्यन्त २८ व २७ प्रकृतिक स्थानके बिना शेष ७ उदयस्थान, सत्त्वस्थान ९० प्रकृतिक एक ही है। मित्रगुणस्थानमें बन्धस्थान २८ प्रकृतिकस्थानको आदि करके दो हैं, उदयस्थान २९ प्रकृतिक स्थानको आदि करके ३ हैं तथा सत्त्वस्थान ९२ व १० प्रकृतिक दो हैं। असंयतगुणस्थान में २८ आदि प्रकृतिरूप तीन बन्धस्थान, २१ से ३१ प्रकृतिक स्थानपर्यन्त २४ प्रकृतिकस्थान बिना ( २४ का उदयस्थान एकेन्द्रिय के होता है) शेष ८ उदयस्थान एवं ९३ आदि प्रकृतिक चार सत्त्वस्थान हैं। देशसंयतगुणस्थानमें २८ आदि प्रकृतिरूप २ बन्धस्थान, ३० आदि प्रकृतिरूप २ उदयस्थान हैं, एवं सत्त्वस्थान असंयतगुणस्थानवत् चार ही हैं। प्रमत्तगुणस्थानमें बन्धस्थान देशसंयतगुणस्थानवत् २ ही हैं, २५ प्रकृतिक एवं २७ आदि प्रकृतिरूप चार इस प्रकार पाँच उदयस्थान एवं सत्त्वस्थान असंयतगुणस्थानवत् ४ ही हैं। अप्रमत्त एवं अपूर्वकरणगुणस्थानमें २८ आदि प्रकृतिरूप क्रमसे ४ व ५ बन्धस्थान हैं, दोनों गुणस्थानों में उदयस्थान ३० प्रकृतिक एक ही है, सत्त्वस्थान असंयतगुणस्थानवत् ४ ही हैं । अनिवृत्तिकरण व सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानमें एक यशस्कीर्ति नामकर्मका ही बन्धस्थान, उदयस्थान ३० प्रकृतिरूप एक हीं है, सत्त्वस्थान ९३ आदि प्रकृतिरूप ४ तथा ८० आदि प्रकृतिरूप ४ इसप्रकार ८ हैं। उपशान्तकषाय और क्षीणकपायंगुणस्थानमें उदयस्थान तो ३० प्रकृतिरूप एक ही है, सत्त्वस्थान ९३ आदि प्रकृतिरूप ४ तो उपशान्तकषायमें एवं ८० आदि प्रकृतिरूप ४ क्षीणकषायमें जानना । सयोगकेवलीके उदयस्थान ३० व ३१ प्रकृतिके दो तथा अयोगकेवलीके ९ व ८ प्रकृतिके दो हैं, सत्त्वस्थान सयोगीगुणस्थानमें ८० प्रकृतिक स्थानको आदि करके ४ हैं तथा अयोगीगुणस्थानमें ८० आदि प्रकृतिरूप ४ और १० व ९, ये दो, इसप्रकार सर्व ६ सत्त्वस्थान हैं।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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