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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६०४
एगेगमट्ट एगेगमट्ठ चदुमट्ट केवलिजिणाणं।
एगचदुरेगचदुरो दोचदु दोछक्क बंधउदयंसा ॥६९४ ।।जुम्मं ।। अर्थ - नामकर्मके बन्ध-उदय और सत्त्वस्थान मिथ्यात्वसे सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानपर्यंत क्रमसे बंधस्थान ६-३-२-३-२-२-४-५-१ व १ हैं, उदयस्थान ९-७-३-८-२-५-१-१.५ और १ हैं, सत्त्वस्थान ६-१-२-४-८-४-४.८ हैं। इसकी जाने वाधक होनेसे उदय-सत्त्वस्थान ही हैं अत: उपशान्तकषायसे अयोगीगुणस्थानपर्यन्त उदयस्थान क्रमसे १-५-२ और २ हैं तथा सत्त्वस्थान ४-४-४ व ६ हैं।
अब उपर्युक्त कथन का ९ गाथाओं में स्पष्टीकरण करते हैं
णामस्स य बंधोदयसत्ताणि गुणं पडुच्च उत्ताणि। पत्तेयादो सव्वं भणिदव्वं अत्थजुत्तीए॥६९५॥
तेवीसादी बंधा इगिवीसादीणि उदयठाणाणि । बाणउदादी सत्तं बंधा पुण अट्ठवीसतियं ॥६९६ ।। इगिवीसादीएक्त्तीसंता सत्तअट्ठवीसूणा । उदया सत्तं णउदी बंधा अट्ठवीसदुगं॥६९७ ।। एगुणतीसत्तिदयं उदयं बाणउदिउदियं सत्तं । अयदे बंधट्ठाणं अट्ठावीसत्तियं होदि।।६९८ ।। उदया चउवीसूणा इगिवीसप्पहदिएकतीसंता। सर्त पढमचउक्कं अपुवकरणोत्ति णायव्वं ॥६९९ ।। अडवीसदुगं बंधो देसे पमदे य तीसदुगमुदओ। पणवीससत्तवीसप्पहुदीचत्तारि ठाणाणि ।।७०० ।। अपमत्ते य अपुव्वे अडवीसादीण बंधमुदओ दु । तीसमणियट्ठिसुहमे जसकित्ती एक्कयं बंधो॥७०१ ।।