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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५७८ अर्थ - मोहनीयकर्मके बन्ध-उदय और सत्त्वस्थानोंमें सर्वभंग जैसे पूर्वमें पृथक्-पृथक् कहे थे उसीहार बंधानिक सोडा दिसतोग भी गाना। अब गुणस्थानकी अपेक्षा मोहनीयकर्मके बन्ध-उदय और सत्त्वस्थान ७ गाथाओंमें कहते हैं अट्ठसु एक्को बंधो उदया चदु ति दुसु चउसु चत्तारि । तिण्णि य कमसो सत्तं तिण्णेगदु चउसु पणम तियं ।।६५३॥ अणियट्टीबंधतियं पणदुगएकारसुहुमउदयंसा । इगि चत्तारि य संते सत्तं तिण्णेव मोहस्स ॥६५४॥ बावीसं दसयचऊ अडवीसतियं च मिच्छबंधादी। इगिवीसं णवयतियं अट्ठावीसे च बिदियगुणे ॥६५५ ।। सत्तरसं णवयतियं अडचउवीसं पुणोवि सत्तरसं। णवचउ अडचउवीस य तिवीसतियमंसयं चउसु ।।६५६ ॥ तेरट्टचऊ देसे पदिदरे णव सगादिचत्तारि। तो णवर्ग छादितियं अडचउरिगिवीससयं च बंधातियं ॥६५७ ।। पंचादिपंचबंधो णवमगुणे दोण्णि एक्कमुदयो दु। अट्ठचदुरेनवीसं तेरादीअट्ठयं सत्तं ॥६५८॥ । लोहेक्कुदओ सुहमे अडचउरिगिवीसमेक्कयं सत्तं । अडचउरिगिवीसंसा संते मोहस्स गुणठाणे ॥६५९॥विसेसयं ।। अर्थ - मोहनीयकर्मके पूर्वोक्त बन्ध-उदय-सत्त्वस्थानोंमें यथासम्भव बन्धस्थान मिथ्यात्वसे अपूर्वकरणपर्यन्त आठगुणस्थानोंमें एक-एक, अभिवृत्तिकरणगुणस्थानमें बन्धस्थान ५ हैं तथा सूक्ष्मसाम्परायउपशान्तकषायगुणस्थानमें मोहनीयकर्मके बन्धका अभाव है। उदयस्थान मिथ्यात्वगुणस्थानमें ४, सासादन व मिश्रमें ३-३, असंयतसे अप्रमत्तपर्यन्त चारगुणस्थानोंमें चार-चार, अपूर्वकरणमें ३, अनिवृत्तिकरण २. सूक्ष्मसाम्परायमें एक और उपशान्तकषायमें उदयस्थाननहीं है। सत्त्वस्थान मिथ्यात्वगुणस्थानमें ३, सासादनमें १, मिश्रमें दो, असंयतसे अप्रमत्तपर्यन्त पाँच-पाँच, अपूर्वकरणमें ३, अनिवृत्तिकरणमें ११. सूक्ष्मसाम्परायमें चार और उपशान्तकषायमें तीन हैं ।।६५३-५४ ।।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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