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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५७७ क्षपकअपूर्वकरण १ (अबन्धकी अपेक्षा) उपशमक अपूर्वकरणवत्। उपशमक अनिवृत्तिक, क्षपक अनिवृत्तिक. ० उपशमक सूक्ष्मसाम्पराय क्षपक सूक्ष्य साम्पराय क्षपक अपूर्वकरणवत्। आराम अकाण- ... .. २... उपशांतकषाय क्षीणकषाय क्षपक अपूर्वकरणवत्। उपशमक अपूर्वकरणवत्। यह भङ्ग अबन्धकी अपेक्षासे है। अबन्धकी अपेक्षासे। . अबन्धकी अपेक्षासे। सयोगकेवली अयोगकेवली ११६ अब वेदनीय-गोत्र-आयु इन तीनोंके मिथ्यात्वादि सर्वगुणस्थानोंमें भंगोंकी संख्या कहते हैं बादालं पणुवीसं सोलसअहियं सयं च वेयणिये । गोदे आरम्मि हवे मिच्छादिअजोगिणो भंगा।।६५० ।। अर्थ - पूर्वमें जो मिथ्यात्वसे अयोगीपर्यन्त गुणस्थानोंमें भंग कहे हैं वे सभी मिलकर वेदनीयकर्मके ४२, गोत्रकर्मके २५ और आयुकर्मके ५१६ भंग होते हैं। आगे वेदनीय-गोत्र और आयुकर्मके सामान्यरूपसे पूर्वोक्त मूलभंगोंकी संख्या कहते हैं वेयणिये अडभंगा गोदे सत्तेव होंति भङ्गा हु। पण णव णव पण भङ्गा आउचउक्केसु विसरित्था ॥६५१।। अर्थ – उन पूर्वोक्त भंगोंमें अपुनरुक्त मूलभंग वेदनीयकर्मके ८ और गोत्रके ७ होते हैं तथा चारों आयुओंके क्रमसे ५, ९, ९ एवं ५ भंग होते हैं। अथानन्तर मोहनीयकर्मके त्रिसंयोगी भंगोंको कहते हैं मोहस्स य बंधोदयसत्तट्ठाणाण सव्वभंगा हु। पत्तेउत्तं व हवे तियसंजोगेवि सव्वत्थ ॥६५२॥
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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