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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५७३ विशेषार्थ - पूर्वमें आयुकी स्थिति बाँधी थी पश्चात् दूसरी अथवा तीसरीबारमें उससे अधिक या हीन अथवा उतनी ही स्थितिको बाँधता है। इनमें जो अधिक स्थिति बाँधी उसी की प्रधानता जाननी तथा यदि हानि हो तो पूर्वमें जो अधिकस्थिति थी उसकी प्रधानता जानना । भुज्यमान आयुकी त्रिभागी अवशेष रहनेपर आयुका बन्ध होता ही है ऐसा एकान्तिक नियम नहीं है। प्रत्येक विभागीकालमें यद्यपि आयुबन्धकी योग्यता है तथापि आयुबन्धका नियम नहीं है। अर्थात् बँधे या नहीं भी बँधे तथा अन्यकालमें आयुका बन्ध होता ही नहीं, यह नियम है। एवमबंधे बंधे उवरदबंधेवि होंति भंगा हु। एक्कस्सेक्कम्मि भवे एक्काउं पडि तये णियमा ॥६४४।। अर्थ – इसप्रकार बन्ध होने अथवा नहीं होनेपर अथवा उपरतबन्धावस्थामें एक जीवके एक पर्यायमें एक-एक आयु के प्रति तीन-तीनभग नियमसे होते हैं। विशेषार्थ – जहाँ वर्तमानकालमें परभवसम्बन्धी आयुका बन्ध हो रहा है वहाँ बन्ध आगामी ..आयुका, उदय भुल्यमापन याराम, सत्त्व भुजापान व बध्यमान दोनों आयुका पाया जाता है। जहाँ आगामी आयुका भूतकालमें बन्ध नहीं हुआ हो और वर्तमानकालमें भी नहीं हो रहा हो तो वहाँ बन्धका अभाव और उदय एवं सत्त्व भुज्यमानआयुका ही पाया जावेगा और जहाँ आमामी आयुका पहले बन्ध हुआ हो और वर्तमानकालमें बन्ध नहीं हो रहा हो वहाँ बन्धका अभाव और उदय भुज्यमान आयुका तथा सत्त्व पूर्वबद्ध व भुज्यमान आयु दोनोंका होता है, यहीं उपरतबन्ध कहलाता है, इसप्रकार एकएक आयुके प्रति तीन-तीन भङ्ग जानना। एकाउस्स तिभंगा संभवआऊहिं ताडिदे णाणा । जीवे इगिभवभङ्गा रूऊणगुणूणमसरित्थे ।।६४५ ।। अर्थ – उक्त एक-एक आयुके तीन-तीन भंगोंको विवक्षित गतिमें आगामी जितनी आयुका बन्ध सम्भव है उस संख्यासे गुणाकर जो-जो प्रमाण होवे उतने नानाजीवों की अपेक्षा एक-एक भवसम्बन्धी भंग होते हैं सो नरक व देवगतिमें तो तिर्यञ्च और मनुष्यायुका ही बन्ध सम्भव है अतः दो से उन तीन भगोंको गुणा करनेपर छह-छह भंग होते हैं तथा मनुष्य व तिर्यञ्चके चारों आयुका बन्ध सम्भव है इसलिये चार से उन तीन भंगोंको गुणा करनेसे १२-१२ भंग होते हैं और अपुनरुक्त भंगोंकी अपेक्षा मध्यमान आयुकी संख्यारूप जो गुणाकार कहा उसमेंसे एक घटानेपर जो प्रमाण हो उसे पूर्वोक्त भंगोंमेंसे घटानेसे अपुनरुक्तभंग होते हैं सो देव व नारकीके तो पाँच-पाँच और मनुष्य व तिर्यञ्चोंके नौनौ अपुनरुक्त भंग हैं।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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