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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५६४ बाणउदि णउदिसत्ता भवणतियाणं च भोगभूमीणं ।
हेट्टिमपुढविचउक्कभवाणं च य सासणे णउदी ।।६२६ ॥ अर्थ – भवनत्रिकदेव, भोगभूमिजमनुष्य और सर्वतिर्यञ्चोंके तथा चतुर्थ, पञ्चम, षष्ठ और सप्तमपृथ्वीके नारकियोंमें ९२ व ९० प्रकृतिक दो सत्त्वस्या एवं सारस्थानधत सभी जीवोंके एक ९० प्रकृतिक सत्त्वस्थान होता है।
चारों गतियोंमें नामकर्मके सत्त्वस्थानसम्बन्धी सन्दृष्टि
नरक गति
| तिर्यञ्चगति।
मनुष्यगति
देवगति
গি
गुणस्थान
सत्त्वस्थान
गुण स्थान
सत्त्व स्थान
गुण . सत्त्व स्थान | स्थान
स्थान
स्थान
९२,९१,९०, ८८ व ८४
| मिथ्यात्व ९२,९२
मिध्यात्व | ९२,९१,९० मिथ्यात्व ९२,९०८८ मिध्यात्व
८४ व ८२ सासादन १० | सासादन |९० सासादन मिश्र ९२,९० | मित्र ९२,९० मिश्र असंक्त | ९२,९१,९० असंयत |९२.९० असंवा
सासादन
मिथ
९२,९०
९२,९० ९३,९२,९१ ९०
असंयत
देशसंयत | ९२,९० देशसंयत
प्रमत्तसंवत अप्रमत्तसंयत अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरण | उपशमश्रेणी |क्षपकश्रेणी
९३,९२,९१,९०/८०,७९.७८,७७ सूक्ष्मसाम्पराया"""" " " " " उपशान्तमोह क्षीणमोह
८०,७९,७८,७ सयोगकेवली अयोगकेवली | द्विचरमसमय चरमसमय
८०,७९,७८,७७ |१०५९ अब प्रकृतियोंके बन्धोदयसत्त्वके त्रिसंयोगी भङ्ग कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं
मूलुत्तरपयडीणं बंधोदयसत्तठाणभंगा हु। भणिदा हु तिसंजोगे एत्तो भंगे परूवेमो ॥६२७ ।।