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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५४९ तीर्थङ्करसम्बन्धी भंगबिना शेष १० भंग हैं। २८ प्रकृतिरूप स्थानके ११७५ भंगों में से सामान्यसमुद्घातकेवलीके १२ और आहारकका एक, इन १३ बिना ११६२ भंग हैं, २९ प्रकृतिक स्थानके १७६० भंगोंमेंसे सामान्यसमुद्घातकेवलीके १२, तीर्थंकरसमुद्घातकेवलीका एक, आहारकका एक, इन १४ बिना शेष १७४६ भंग हैं। ३० प्रकृतिक स्थानके २९२१ भंगोंमें से सामान्यकेवलीके २४, तीर्थङ्करकेवलीका एक इन २५ बिना शेष २८९६ भंग हैं। ३१ प्रकृतिकस्थानके ११६१ भंगोंमें से एक तीर्थंकरकेवलीके एक भङ्गबिना शेष ११६० भंग हैं। इसप्रकार मिथ्यात्व गुणस्थानसम्बन्धी सर्व (५९+२७+१८+६१४+१०+११६२+१७४६+२८९६+११६०) ७६९२ भंग जानना। सासादनगुणस्थान में २१ प्रकृतिक स्थानके बादरपृथ्वी-जल तथा प्रत्येकवनस्पतिकायके यशस्कीर्तियुगलकी ६, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय व असञ्जीके यशस्कीर्तियुगलकी अपेक्षा ८ भंग, सञ्जीपञ्चेन्द्रियतिर्यञ्चके दुर्भग-अनादेय-अयशस्कीर्तिरूप ३ युगलोंकी अपेक्षा आठभङ्ग, मनुष्यके भी इसीप्रकार ८ भङ्ग और देवका एक भङ्ग ऐसे सर्व (८+८+८+६+१) ३१ भंग हैं। २४ प्रकृतिके स्थानमें बादरपृथ्वीअप् एवं प्रत्येकवनस्पतिकायके यशस्कीर्तियुगलकी अपेक्षा ६ भंग है। २५ प्रकृतिकस्थान में देवगतिका एक भंग है। २६ प्रकृतिक स्थानमें द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असञ्जीके यशस्कीर्तियुगलकी अपेक्षा आठभंग, सञ्जीपञ्चेन्द्रियतिर्यञ्चके ६ संस्थान, ६ संहनन एवं सुभगआदेय और यशस्कीर्तिरूप तीन युगलोंकी अपेक्षा (६४६x२x२४२) २८८ भंग उसीप्रकार मनुष्यके भी २८८ ऐसे सर्व (८+२८८+२८८) ५८४ भंग हैं। इस गुणस्थानमें २७-२८ प्रकृतिका उदय नहीं है, क्योंकि शरीरपर्याप्ति आदिकालोंमें एकेन्द्रियादिकके मिथ्यात्व ही है। २९ प्रकृतिक स्थानमें देव-नारकीके दो भंग हैं। ३० प्रकृतिक स्थानके भाषापर्याप्तिकालमें सञ्जीतिर्यञ्चके ६ संहनन, ६ संस्थान एवं विहायोगति, सुभग, सुस्वर, आदेय और यशस्कीर्तिरूप पाँच युगलोंकी अपेक्षा (६x६५२४२४२४२४२) ११५२ भंग तथा मनुष्यके भी १९५२ भंग हैं इसप्रकार मनुष्यतिर्यञ्चसम्बन्धी २३०४ भंग हैं। ३१ प्रकृतिके उद्योतसहित सञ्जीके भाषा पर्याप्तिकालमें ११५२ भंग हैं। इसप्रकार सासादनगुणस्थानमें सर्व (३१+६+१+५८४+२+२३०४+११५२) ४०८० भंग जानना । मिश्रगुणस्थान में २९ प्रकृतिक स्थानमें देव-नारकीके भाषापर्याप्सिकालमें एक-एक भंग होनेसे दो भंग, ३० प्रकृतिक स्थानमें सञीपञ्चेन्द्रियतिर्यञ्च और मनुष्यके मिलकर २३०४ भंग हैं। ३१ प्रकृतिक उदयस्थानमें उद्योतसहित सञ्जीपञ्चेन्द्रियतिर्यञ्चके ५१५२ भंग हैं। इसप्रकार मिश्रगुणस्थानसम्बन्धी सर्व (२+२३०४+११५२) ३४५८ भंग हैं। असंयतगुणस्थान में २१ प्रकृतिक उदयस्थानके चारोंगतिसम्बन्धी एक-एक भंगकी अपेक्षा चारभंग हैं । २५ प्रकृतिकस्थानके घर्मानरक और वैमानिकदेवसम्बन्धी एक-एक भंगकी अपेक्षा दो भंग, २६ प्रकृतिक उदयस्थानमें भोगभूमिजतिर्यञ्चके शुभ प्रकृतियोंका ही उदय होनेसे एकभंग और
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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