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गोम्मटसार कर्मकाण्ड- ५४८
(१+५७६+८+२४+११५२+११५२+८) = २९२१ भंग हैं तथा तीर्थंकररहित समुद्घातकेवलीके भाषापर्याप्तिकालसम्बन्धी २४ भंग हैं, किन्तु वे पुनरुक्त हैं अत: इनमें कुछ भी विशेषता नहीं है।
३१ प्रकृतिक स्थानके भाषापर्याप्तिकालमें तीर्थंकरकेवलीके एक भंग है एवं उद्योतसहित सञ्ज्ञीपञ्चेन्द्रियतिर्यञ्चमें पूर्वोक्तप्रकार ६ संस्थान - ६ संहनन एवं विहायोगति, सुभग, सुस्वर, आदेय और यशस्कीर्तिरूप पाँचयुगलोंकी अपेक्षा (६×६x२x२x२x२x२) ११५२ भंग, उद्योतसहित द्वीन्द्रियत्रीन्द्रिय- चतुरिन्द्रिय और असञ्जीपचेन्द्रिय के यशस्कीर्तियुगलकी अपेक्षा दो-दो भंग होनेसे ८ भंग हैं। इसप्रकार ३१ प्रकृतिक स्थानमें (१+११५२+८) १९६१ भंग हैं। तीर्थंकरप्रकृतिसहित समुद्घातकेवलीके एक भंग है, किन्तु वह पुनरुक्त है तथा अयोगकेवलीके तीर्थंकरप्रकृतिसहित ९ प्रकृतिक स्थानका एक भंग है एवं तीर्थंकरप्रकृतिरहित ८ प्रकृतिक स्थानका एकभंग, इसप्रकार सर्व (१+६०+२७+१९+६२०+१२+११७५+१७६०+२९२१+११६१+१+१) ७७५८ भंग होते हैं।
पूर्वगाथामें जो पुनरुक्तभङ्ग कहे हैं उनको कहते हैं
सामण्णकेवलिस्स समुग्घादगदस्स तस्स वचि भंगा । तित्थस्सवि सगभंगा समेदि तत्थेक्कमवणिज्जो ||६०६ ॥
अर्थ - भाषापर्याप्तिकालमें सामान्यकेवलीके तथा सामान्यसमुद्घातकेवलीके ३० प्रकृतिक स्थानमें २४-२४ भंग समान हैं तथा तीर्थंकरकेवली और तीर्थंकरसमुद्घातकेवलीके ३१ प्रकृतिकस्थानमें एक-एक भंग है सो वह भी समान है इसकारण ये २५ भंग पुनरुक्त होनेसे ग्रहण नहीं किये जाने चाहिए । अथानन्तर गुणस्थानोंमें उन भङ्गोंको कहते हैं
णारयसण्णिमणुस्ससुराणं उवरिमगुणाण भंगा जे ।
पुणरुत्ता इदि अवणिय भणिया मिच्छस्स भंगेसु ॥ ६०७ ॥
अर्थ - नारकी सञ्ज्ञीतिर्यञ्च मनुष्य और देवोंके ऊपरवर्ती सासादनादिगुणस्थानोंमें जो भंग हैं। मिथ्यात्वगुणस्थानसम्बन्धी भंगोंके समान हैं अतः पुनरुक्त हैं सो उन पुनरुक्तभंगोंको घटाकर केवल मिथ्यात्वगुणस्थानके भंगोंमें ही उनको भी कहा गया है।
विशेषार्थ - २१ प्रकृतिक स्थानके ६० भंगोंमेंसे तीर्थङ्करप्रकृतिसम्बन्धी एक भंगको घटानेपर शेष ५९ भंग, २४ प्रकृतिक स्थानके २७ भंग, २५ प्रकृतिक स्थानके १९ भंगोंमेंसे आहारकमिश्रसम्बन्धी एकभंगके बिना शेष १८ भंग हैं, २६ प्रकृतिक स्थानके ६२० भंगों में से सामान्य समुद्घातकेवली के संस्थानजन्य ६ भंगबिना शेष ६१४ भंग हैं, २७ प्रकृतिक स्थानके १२ भंगों से आहारक और