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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५२९ODE 2 R पीछे देवगतिसहित २८ प्रकृतिको बाँधे तो उसके ६४ अल्पतरभंग होते हैं ये पुनरुक्त भंग भी मिथ्यादृष्टिसंबंधी भंगों के साथ ही कह आए हैं। दृष्टि असंयत के भुजकार ६४ ८x८ ६४ ८४८ देव. २९ मनु. ३० ८ ८ देव. २८ ८ देव. २९ ८ ३६,८६४ ८x४६०८ भनु. ३० ८ मनु. २९ ४६०८ असंयतकं अल्पतर ८ ८ × १ ६४ ८x८ नरक २८ देव. २९ १ ८ देव. २९ | मनु. ३० ८ ८ पुनरुक्त ६४ ८x८ देव. २८ ८ मनु. २९ ८ आगे अप्रमत्तादि गुणस्थानोंमें भुजकारभंगोंको कहते हैं असंयतके अंगों का योग भुजकार ३६,९९२ अल्पतर ७२ अवस्थित ३७,०६४ देवजुदेक्कट्ठाणे णरतीसे अप्पमत्तभुजयारा | पणदालिगिहारुभये भंगा पुणरुत्तगा होंति ।।५७६ ।। अर्थ- अप्रमत्तगुणस्थानवर्ती मनुष्य देवगतिसंयुक्त २८ प्रकृतिरूप एकस्थानको बाँधता था । पश्चात् ८ भङ्गसंयुक्त आहारकद्विकसहित ३० प्रकृतिक स्थान का बन्ध करने लगा। इसीप्रकार तीर्थङ्करसहित २८ से २९ प्रकृति तथा तीर्थङ्कर और आहारकद्विकसहित २९ से ३१ प्रकृतिरूप एवं ३० से ३१ प्रकृतिरूप अथवा २८ से ३१ प्रकृतिरूप स्थान बाँधने लगा अतः इन सर्वस्थानोंके भङ्गोंको मिलानेपर अप्रमत्तगुणस्थानमें ४५ भुजकार भङ्ग होते हैं। अब उन ४५ भुजकारभङ्गोंका विधान कहते हैं इगि अड अगि अट्ठगिभेदड अट्टड दुणव य वीस तीसक्के । अडिगगि अडिगिगि बिहि उणखिगि इगिड़गितीस देवचउ कमसो ॥ ५७७ ॥ अर्थ- नीचेकी पंक्तिके १-८-८-१-८-१-१-१-१ और १ रूप भङ्ग सहित २८- २८-२८२९-२९-३०-१-१-१-१ प्रकृतिरूप स्थानोंमें तथा ऊ परकी पंक्तिके ८-१-१-८-१-१-१-१-१-१ भङ्गों सहित २९-३०-३१-३०-३१-३१-२८ २९ ३० ३१ इसप्रकार ४५ भुजकार भङ्ग जानना । विशेषार्थ - अप्रमत्तगुणस्थानीय देवगतिसहित २८ प्रकृतिका एक भङ्ग बाँधता था पश्चात्
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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