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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५२४ ।
आगे अल्पतर भङ्गोंका कथन करते हैं
विवरीयेणप्पदरा होंति हु तेरासिएण भंगा हु।
पुव्वपरट्ठाणाणं भंगा इच्छा फलं कमसो॥५६९। अर्थ- भुजकारबन्धके भंगोंकी संख्या प्राप्त करनेके लिए जिस क्रमसे त्रैराशिक विधिकी थी उससे विपरीत क्रमसे त्रैराशिक विधि करनेपर अल्पतरभंगोंका प्रमाण प्राप्त होता है। पूर्वस्थानके भंगोंको इच्छाराशि तथा आगे-आगेके स्थानोंके भंगोंको फलराशि माननेपर अनुक्रमसे अल्पतरबन्धके अंगोंका प्रमाण प्राप्त होता है। विशेषार्थ
तीसाइ तेवीसंता तह तीसुगुतीसमेक्कमिगितीसं ॥२५९ ।। इक्वं बंधइ णियमा अडवीसुगुतीस बंधंतो।
उवरदवंधो हेला एवं देवेसु तीसमुगुतीसा॥२६० ।। अर्थ- ३० प्रकृतिकस्थानको आदि लेकर २३ प्रकृतिक स्थानपर्यन्तके स्थानोंको बाँधनेपर तथा ३१ प्रकृतिक स्थानको बाँधकर २९ और एक प्रकृतिक स्थानको बाँधनेपर अट्ठाईस और उनतीस प्रकृतिक स्थानको बाँधनेवाला एक प्रकृतिका बन्ध करता है तो अल्पतरबन्धस्थान होते हैं। अङ्क सन्दृष्टि , इसप्रकार हैस्वस्थान अल्पतरबन्धस्थान संख्या- ५ ४ ३ २ १ ३ १ १ १ अल्पतर
३० २९ २८ २६ २५ ३१ २८ २९ ३० बन्ध
२९ २८ २६ २५ २३ ३० १ १ १ स्थानोंमें २८ २६ २५ २३ प्रकृति
२६ २५ २३ संख्या
२५ २३
अवक्तव्यबन्धस्थान- उपरत बन्धवाला नीचे उतरकर एक प्रकृतिका बन्ध करता है अथवा मरकर देवोंमें उत्पन्न हो तीस अथवा २१ प्रकृतियोंको बाँधता है।
तीन अवक्तव्य बन्धस्थानोंकी अङ्क सन्दृष्टि- ०
१.प्रा.प.स.पृ. १९८