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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-५०१
सण्णाणे चरिमपणं, केवलजहखादसंजमे सुण्णं।
सुदमिव संजमतिदए, परिहारे णत्थि चरिमपदं ॥५४७।। अर्थ- मतिज्ञानादि चारसम्यग्ज्ञानोंमें अन्तिम पाँच बन्धस्थान हैं। केवलज्ञान और यथाख्यातसंयममें शून्य अर्थात् बन्धस्थानका अभाव है। संयमोंमें श्रुतज्ञानके समान ५ बन्धस्थान हैं, किन्तु परिहारविशुद्धिसंयममें अन्तिमस्थानबिना बारस्थान हैं।
विशेषार्थ- मति-श्रुत-अवधि और मन:पर्ययज्ञानमें २८-२९-३०-३१ और १ प्रकृतिरूप ५ बन्धस्थान नामकर्मके हैं। मतिआदि तीनज्ञान पर्याप्त व निर्वृत्त्यपर्याप्तनारकी और सञ्जीतिर्यञ्च, मनुष्य
और देवोंमें पाए जाते हैं। यहाँ नारकीजीवोंके मनुष्यगतिसंयुक्त २९ प्रकृतिका तथा आदिकी तीनपृथ्चियोंमें मनुष्यगति-तीर्थङ्करसहित ३० प्रकृतिका ये दो बन्धस्थान हैं, सौधर्मादि स्वर्गके देवोंमें भी ये ही दो बन्धस्थान हैं। भवनत्रिकदेवोंमें मनुष्यगतिसहित २९ प्रकृतिका ही बन्धस्थान है तथा तिर्यञ्चगतिमें देवगतिसहित २८ प्रकृतिरूप बन्धस्थान है। मनुष्योंके देवगतिसहित २८ एवं देवगतितीर्थङ्करसहित २९ प्रकृतिका स्थान है तथा ३०, ३१ व १ प्रकृतिक बन्धस्थान भी हैं। इसप्रकार मतिआदि तीनज्ञानोंमें बन्धस्थान कहे। मनः पर्ययज्ञानसहित चारज्ञानोंमें प्रमत्तगुणस्थानमें २८ व २९ प्रकृतिक दो स्थान हैं तथा अप्रमत्त और अपूर्वकरणगुणस्थानके छठेभागपर्यन्त २८ व २९ प्रकृतिक दो एवं देवगति-आहारकद्विकसंयुक्त ३० प्रकृतिक और देवगति, तीर्थकर व आहारकद्विकसंयुक्त ३१ प्रकृतिक ये चारबन्धस्थान हैं। अपूर्वकरणगुणस्थानके सप्तमभागसे सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानपर्यन्त यशस्कीर्तिरूप एक बन्धस्थान है। केवलज्ञानमें नामकर्मके बन्धका अभाव है। सामायिक-छेदोपस्थापनासंयममें श्रुतज्ञानवत् ५ बन्धस्थान हैं, किन्तु परिहारविशुद्धिसंयममें इन 4 में से अन्तिमस्थान नहीं है अत: वहाँ चार ही बन्धस्थान जानना।
सामायिक-छेदोपस्थापनासयममें प्रमत्तगुणस्थानमें देवगतिसंयुक्त २८ प्रकृतिका और देवगतितीर्थकरसहित २९ प्रकृतिका ये दो बन्धस्थान हैं। अप्रमत्त व अपूर्वकरणगुणस्थानके छठेभागपर्यन्त पूर्वोक्त दो और देवगति एवं आहारकद्विकयुत ३० प्रकृतिका, तीर्थङ्कर व आहारकद्विकसहित ३१ प्रकृतिका इसप्रकार चार बन्धस्थान हैं। अपूर्वकरणगुणस्थानके सप्तमभागसे अनिवृत्तिगुणस्थानपर्यन्त एकप्रकृतिरूप एक ही बन्धस्थान है। परिहारविशुद्धिसंयममें सामायिकसयमवत् प्रमत्तगुणस्थानमें दो एवं अप्रमत्तगुणस्थानमें चार बन्धस्थान हैं, यहाँ श्रेणीआरोहणका अभाव होनेसे एकप्रकृतिरूप बन्धस्थान नहीं है।'
अंतिमठाणं सुहुमे, देसाविरदीसु हारकम्मं वा। चक्खूजुगले सव्वं, सगसगणाणं व ओहिदुगे॥५४८।।
१. प्रा.पं.सं.पृ. ५०४ व ५०५ गाथा ४४७ व ४४९।