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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४९०
तित्थेणाहारदुर्ग, एक्कसराहेण बंधमेदीदि। पक्खित्ते ठाणाणं, पयडीण होदि परिसंखा ॥५२९ ।।
अर्थ- तीर्थङ्कर और आहारकद्विकका युगपत् भी बन्ध होता है। अतः पूर्वोक्त २३ प्रकृतियोंमें यथासम्भव प्रकृतियोंके मिलानेसे स्थान और प्रकृतियोंकी संख्या हो जाती है।
इसी बात को दो गाथाओं द्वारा स्पष्ट करते हैं
एयक्खअपज्जतं, गिपज्जत्तबितिचपणरापजत्तं । एइंदियपज्जत्तं, सुरणिरयगईहिं संजुत्तं ॥५३०॥
पज्जत्तगवितिचपमणुसदेवगदिसंजुदाणि दोण्णि पुणो। सुरगदिजुद मगदिजुदं बंधट्ठाणाणि णामस्स ॥५३१॥ जुम्मं ॥
अर्थ- एकेन्द्रियअपर्याप्तसहित २३ प्रकृतिका एक बन्धस्थान है, एकेन्द्रिय पयांप्त-द्वीन्द्रियत्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रिय-पञ्चेन्द्रियतिर्यञ्च तथा मनुष्यअपर्याप्तसहित २५ प्रकृतिके ६ स्थान हैं, एकेन्द्रियपर्याप्त आतप अथवा उद्योतसहित २६ प्रकृतिक २ स्थान, देव या नरकगतिसहित २८ प्रकृतिरूप २ स्थान, द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रिय-पञ्चेन्द्रिय-तिर्यञ्च और मनुष्यपर्याप्तसहित २९ प्रकृतिका बन्ध होता है तथा तीर्थङ्कर सहित देवगतिसंयुक्त भी २९ प्रकृसिक स्थान है, इसप्रकार ये ६ स्थान २९ प्रकृतिसम्बन्धी होते हैं। उद्योतसहित द्वि-त्री-चतु-पंचेन्द्रियतिर्यञ्चसंयुक्त ४ स्थान और तीर्थङ्करसहित मनुष्यगतिसंयुक्त एवं आहारकद्विकसहित देवगतिसंयुक्त ये २ स्थान मिलकर ६ स्थान ३० प्रकृतिसम्बन्धी हैं, आहारकद्विकतीर्थकरसहित देवगतिसंयुक्त ३१ प्रकृतिका एक ही स्थान है और अपूर्वकरणगुणस्थानके सप्तमभागसे सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानपर्यन्त यशस्कीर्तिसहित १ प्रकृतिक एक ही स्थान है।