________________
गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४७९
नोट- प्रा.पं.सं.पृ. ४८२ गा. ३९२ में १५४१८ संख्या बतलाई है।
सम्यक्त्वके आश्रयसे मोहनीयकर्मके उदयस्थान और प्रकृतियोंकी संदृष्टिगुणस्थान उदयस्थान सम्यक्त्व भंग | प्रकृति सम्यक्त्वxभंग असंयत वेदकसम्यक्त्व
३२४१ = ३२४ २४ = ७६८ औपशमिक, क्षायिक ४४२ = ८४२४ = १९२ २८x२ = ५६४२४ = १३४४ देशसंयत वेदकसम्य. ४४१ = ४४२४ = १६ २८x१ = २८४२४ = ६७२
औपमिक, क्षायिक ४४२ = ८४२४ = ५९२ २४४२ = ४८४२४ = ११५२ प्रमत्त वेदकसम्यक्त्व ४४१ = ४४२४ = ९६ २४४१ = २४४२४ = ५७६
औपशमिक, क्षायिक ४४२ = ८४२४ = १९२ २०४२ = ४०४२४ = ९६० अप्रमत्त वेदकसम्य. ४४१ = ४४२४ - ९६ २४४५ = २४४२४ = ५७६ औपशमिक, क्षायिक | ४४२ = ८४२४ - १९२ २०४२ = ४०४२४ = ९६०
अपूर्वकरण औपशमिक, क्षायिक ४४२ = ८४२४ = १९२ २०४२ = ४०४२४ - ९६ अनिवृत्ति. सवेदभाग । १४२ - २४५२ = २४ २४२ = ४४१२ : ४८ अनिवृत्ति. अवेदभाग | १४२ - २४४ = ८ १४२ = २४४ सूक्ष्मसाम्पराय १४२ = २४१ - २ १४२ - २४५ - २
कुल स्थान =१३७८ | कुल प्रकृतियाँ ८०२६ | आगे मोहनीयकर्मके सत्त्वस्थानका कथन ११ गाथाओंसे करते हैं
अट्ठय सत्तय छक्क य, चदुतिदुगेगाधिमाणि वीसाणि ।
तेरस बारेयारं, पणादि एगूणयं सत्तं ॥५०८॥ अर्थ- मोहनीयकर्मके २८-२७-२६-२४-२३-२२-२१-१३-१२-१५ और ५ प्रकृति रूप ११ तथा ५ प्रकृतिसे भी एक-एक प्रकृति कम अर्थात् ४-३-२ और १ प्रकृतिरूप ४ स्थान इस प्रकार सर्व १५ सत्त्वस्थान हैं।
विशेषार्थ- दर्शनमोहनीयकी ३ और चारित्रमोहनीयकी २५ प्रकृति इन २८ प्रकृतिका प्रथम
५. प्रा. पं. सं. पृ. ३२० गाथा ३३।