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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४७७ अनिवृत्तिकरण | १४२ = २४१२ = २४ । २४२ = ४४१२ = ४८ सवेदभाग अवेदभाग १४२ = २४४ - ८ । १४२ -२४४ = ८ सूक्ष्मसाम्पराय| १४१ = १४५ - १ । कुलस्थान - १३७७ । कुल प्रकृतियाँ ७३५३ अथानन्तर किस गुणस्थानमें कौनसी श्या होती है सो कहते हैं मिच्छ चउक्के छक्वं, देसतिये तिण्णि होंति सुहलेस्सा। जोगित्ति सुक्कलेस्सा, अजोगिठाणं अलेस्सं तु ॥५०३॥ . अर्थ-- मिथ्यात्व-सासादन-मिश्र और असंयतगुणस्थानमें छह लेश्या होती हैं; देशसंयत, प्रमत्त और अप्रमत्त गुणस्थान में तीन शुभलेश्या हैं तथा अपूर्वकरण से सयोगीगुणस्थानतक एक शुक्ललेश्या ही है एवं अयोगीगुणस्थानमें लेश्याका अभाव है। उपर्युक्त गाथामें कथित लेश्याके आश्रयसे मोहनीयकर्मके उदयस्थान और प्रकृतियोंकी संख्या दो गाथाओंसे कहते हैं पंचसहस्सा बेसयसत्ताणउदी हवंति उदयस्स। ठाणवियप्पे जाणसु, लेस्सं पडि मोहणीयस्स ।।५०४॥२ अर्थ- लेश्याकी अपेक्षासे मोहनीयकर्मके स्थानोंके भेद ५,२९७ होते हैं ऐसा हे शिष्य! तू जान । अट्ठतीससहस्सा, बेण्णिसया होंति सत्ततीसा य। पयडीणं परिमाणं, लेस्सं पडि मोहणीयस्स ॥५०५॥ अर्थ-लेश्याके आश्रयसे मोहनीयकर्मकी प्रकृतियोंका परिमाण ३८,२३७ होता है, ऐसा जानना चाहिए। १. देखो प्रा. पं. सं. १. ४७०-७१. गाथा ३७२-३७३। २. प्रा.पं.सं.पृ. ४७३ गाथा ३७९ भी देखो। ३. प्रा.पं.स.पू. ४७५ गा. ३८६ भी देखो।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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