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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४७१ अर्थ- मिथ्यात्व-सासादन-असंयत और प्रमत्तविरत इन चार गुणस्थानों में अपर्याप्त व पर्याप्त योग सम्बन्धी स्थान और प्रकृतियों को योगों से गुणा करने पर स्थान और प्रकृतियों का प्रमाण होता है तथा शेष गुणस्थानों में केवल पर्याप्त योग के स्थान और उनकी प्रकृतियों को पर्याप्त सम्बन्धी योग से गुणा करने पर पर्याप्त योग सम्बन्धी गुणस्थानों के स्थान और प्रकृतियों का प्रमाण प्राप्त होता है। विशेषार्थ- मिथ्यात्वगुणस्थान में चार स्थान और उनकी ३६ प्रकृतियों को १३ योगों से गुणा करने पर ५२ स्थान और ४६८ प्रकृतियां होती हैं तथा अनन्तानुबन्धी रहित मिथ्यात्वगुणस्थान अपर्याप्तावस्था में नहीं होता है अतः पिछले कूट की बत्तीस प्रकृति और ४ स्थान हैं इनको पर्याप्त सम्बन्धी १० योगों से गुणा करने पर ४० स्थान और ३२० प्रकृतियाँ होती हैं। इस प्रकार मिथ्यात्वगुणस्थान में पर्याप्त-अपर्याप्तावस्था सम्बन्धी सर्वस्थान ५२+४० =९२ एवं इन स्थानों की ४६८+३२०-७८८ प्रकृतियाँ जाननी चाहिए। सासादन गुणस्थान में स्थान चार और उनकी प्रकृतियाँ बत्तीस हैं। इनमें बारह योग से गुणा करने पर स्थान तो ४८ हए तथा प्रकृतियाँ ३८४ जानना । यहाँ बारह योग से ही गुणा करने का यही कारण है कि वैक्रियिकमिश्नकाययोग का कथन पृथक् करेंगे। मिश्रगुणस्थान में चार स्थान व उनकी बत्तीस प्रकृतियाँ हैं, इनको १० योग से गुणा करने पर ४० स्थान तथा ३२० प्रकृतियाँ होती हैं। असंयतगुणस्थान में आठ स्थान व उनकी ६० प्रकृतियों को १० योगों से गुणा करने पर स्थान ८० और प्रकृतियाँ ६०० होती हैं। यहाँ १० योगों से ही गुणा करने का यह कारण है कि औदारिक-बैक्रियिकमिश्रकाययोग व कार्मणकाययोग का पृथक वर्णन करेंगे। देशसंयतगुणस्थान में स्थान ८ और उनकी प्रकृतियाँ ५२ हैं इनको ९ योगों से गुणा करने पर स्थान ७२ एवं प्रकृति ४६८ होती हैं। प्रमत्त और अप्रमत्तगुणस्थान में स्थान ८ व प्रकृतियाँ ४४ हैं अत: इन स्थान व प्रकृतियों में ९ योगों से गुणा करने पर प्रमन-अप्रमत्त गुणस्थान के स्थान ७२-७२ तथा प्रकृतियाँ ३९६-३९६ हैं। यहाँ १ योगों से ही गुणा करने का कारण यह है कि आहारक-काययोग और आहारकमिश्रकाययोग का वर्णन पृथक् करेंगे। अपूर्वकरण गुणस्थान में चारस्थान और उनकी २० प्रकृतियाँ हैं इनको ९ योगों से गुणा करनेपर स्थान तो ३६ और प्रकृतियाँ १८० होती हैं । इसप्रकार अपूर्वकरणगुणस्थानपर्यंत योगोंकी अपेक्षा स्थान और प्रकृतियोंको गुणा करनेसे तथा सर्वस्थान और प्रकृतियोंका कुल जोड़करके (९२+४८+ ४०+८०+७२+७२+७२+३६= ) ५१२ स्थान एवं (७८८+३८४+३२०+६००+४६८+३९६+ ३९६+१८७८) ३५३२ प्रकृतियाँ हुई। इस स्थान (५१२) और प्रकृतियों (३५३२) की २४ भंगोंसे गुणा करने पर ५१२४२४ = १२.२८८ स्थान एवं ३५३२४२४-८४,७६८ प्रकृतियाँ होती हैं। १. प्रा.पं.सं. पृ. ४५६ गाथा ३४४ से पृ. ४६: गाथा ३५४ तक, किन्तु प्रमन गुणस्थानमें अन्तर है।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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