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________________ माम्मटसार कर्मकाण्ड-४६६ हैं और इनकी २४ प्रकृतियाँ हैं इस प्रकार पूर्वोक्त चार स्थान और ये चार स्थान मिलाने पर स्थान तो आठ हैं और पूर्वोक्त २८ प्रकृतियों में २४ प्रकृतियाँ मिलाने से ५२ प्रकृतियाँ हैं इनमें ६ उपयोग से गुणा करने से ४८ स्थान और ३१२ प्रकृतियाँ होती हैं। प्रमत्त व अप्रमत्त गुणस्थान में वेदकसम्यक्त्वसहित पहले कूट में सात प्रकृतिरूप एक, छह प्रकृतिरूप दो और पाँच प्रकृतिरूप एक स्थान, इस प्रकार चार स्थान और २४ प्रकृतियों में वेदकसम्यक्त्वरहित पिछले कूट में छह प्रकृति रूप एक, पाँच प्रकृतिरूप दो और चार प्रकृतिरूप एक स्थान इस प्रकार चार स्थान और २० प्रकृतियाँ मिलाने पर ८ स्थान और ४४ प्रकृतियाँ हुईं इनमें सात उपयोग से गुणा करने पर प्रमत्त व अप्रमत्तगुणस्थान के ५६-५६ स्थान और ३०८-३०८ प्रकृतियाँ होती हैं। अपूर्वकरण गुणस्थान में ६ प्रकृतिरूप एक, पाँच प्रकृतिरूप दो और चार प्रकृतिरूप एक स्थान इस प्रकार चार स्थान और उनकी २० प्रकृतियों को सात उपयोग से गुणा करने पर २८ स्थान और १४० प्रकृतियाँ होती हैं। मिथ्यात्व गुणस्थान से अपूर्वकरण गुणस्थान पर्यन्त उपर्युक्त सभी स्थान व प्राकृतियों की संख्या को जोड़ देने पर (४०+२.० + २४.+४८+४८+५६+५६+२८= ) ३२० स्थान तथा (३४०+१६०+१९२+३६० +३१२+३०८+३०८+१४०= } २५२० प्रकृतियाँ जानना। इन सभी स्थानों और प्रकृतियों में २४ भंगों से गुणा करने पर (३२०४२४) ७६८० तो उदयस्थानों के भंग एवं २१२०४२४:५०८८० प्रकृतियाँ हुईं। ___ अनिवृत्तिकरण गुणस्थान में २ प्रकृतिरूप एक स्थान को ५ उपयोग से गुणा करने पर ७ स्थान और प्रकृतियाँ १४ होती हैं इनको १२ भंगों से गुणा करें तो स्थानों की संख्या ८४ तथा प्रकृतियों की संख्या १६८ होती है। अनिवृत्तिकरण गुणस्थान के अवेदभाग में एक प्रकृतिरूप एक स्थान है इनको ७ उपयोग से गुणा करने पर ७ स्थान और ७ ही प्रकृतियाँ हुईं, इनमें पुन: ४ भंग से गुणा करने पर २८ स्थान और २८ ही प्रकृतियाँ होती हैं। सूक्ष्मसापराय गुणस्थान में एक प्रकृतिरूप एक स्थान है। यहाँ इनको ७ उपयोग से गुणा करने पर ७ स्थान और ७ ही प्रकृतियाँ है। यहाँ पर भंग एक ही है अतः उसका गुणा करने पर ७ स्थान व उनकी ७ प्रकृतियाँ हुई। इस प्रकार अनिवृत्तिकरण गुणस्थान और सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान सम्बन्धी स्थान और प्रकृतियों की संख्या (८४+२८+७=१५९ स्थान) (१६८+ २८+७=२०३ प्रकृतियाँ) जानना। इनको अपूर्वकरण गुणस्थान तक ऊपर जो स्थान और प्रकृतियाँ कही गई हैं उनमें मिलाना चाहिए। ५. प्रा.पं.सं.पू. ४६५-४६६ माथा ३६२ की टीम।। २. प्रा.पं.स.पू. ४६६ गाथा ३६३ व टीका।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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