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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४५२ भेदेण अवत्तव्वा, ओदरमाणम्मि एक्कयं मरणे। दो चेव होंति एत्थवि, तिण्णेव अवट्टिदा भंगा ॥४७४।। अर्थ-भंगविवक्षा से अवक्तव्यबन्ध कहा है। सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान मोहनीय कर्म के बन्ध से रहित है अत: वहाँ से नीचे उतरकर अनिवृत्तिकरणगुणस्थानवर्ती होकर सज्वलनलोभ को बाँधता है सो एक तो यह अवक्तव्यबन्ध का भंग है और मरण करके देवअसंयत होकर दो प्रकार से १७ प्रकृतियों का बन्ध करता है इस अपेक्षा अवक्तव्यबन्ध के दो भंग हैं। ऐसे अवक्तव्यबन्ध के सर्व (१+२) ३ भंग हैं। भुजकारबन्ध के पूर्वोक्त १२७, अल्पतरबन्ध के ४५ और अवक्तव्यबन्ध के ३ भंगों में द्वितीयादिक समयों में समान प्रकृतियों का बन्ध होने से अवस्थितबन्ध होता है जिसके १२७+४५+३=१७५ भंग जानना। मोहनीयकर्म के सामान्य-विशेष भुजकारादि चार प्रकार के बन्ध को कहकर अब मोहनीयकर्म के उदयस्थान कहते हैं दस णव अट्ट य द य. छपणा चजारि सोगिता ! उदयट्ठाणा मोहे, णव चेव य होंति णियमेण ॥४७५॥' अर्थ- मोहनीयकर्म के उदयस्थान दस, नौ, आठ, सात, छह, पाँच, चार, दो और एक प्रकृति रूप ९ ही हैं ऐसा नियम से जानना । मिच्छं मिस्सं सगुणे, वेदगसम्मेव होदि सम्मत्तं । एक्का कसायजादी, वेददुजुगलाणमेक्वं च ।।४७६ ॥ अर्थ- मोहनीयकर्म की उदयप्रकृतियों में मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृति अपने-अपने गुणस्थान में ही उदय होती हैं, किन्तु सम्यक्त्व प्रकृति वेदक सम्यग्दृष्टि जीव के असंयतादि चार गुणस्थानों में उदय होती है तथा अनन्तानुबन्धी आदि चारकषायों की क्रोध, मान, मायारूप चार जाति में से एक-एक कषायजाति का, तीनों वेदों में से एक वेद का, हास्य-रति और अरति-शोकरूप दो युगलों में से किसी एक युगल का उदय पाया जाता है। भय सहियं च जुगुञ्छासहियं दोहिंवि जुदं च ठाणाणि। मिच्छादिअपुव्वंते, चत्तारि हवंति णियमेण ॥४७७॥ १. “एक्कं च दो बचत्तारि तदो एयाधिया दसुझस्सं । ओघेण मोहणिजे उदयट्ठाणाणि णव होति।" प्रा. पं. सं. पृ. ३१९ गाथा ३० व पृ. ४३८ गा. ३०३।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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