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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-४३१ "अपक्चपाचनमुदीरणेति" उदय के लिए अपक्वकर्मों का पाचन करना (पचना) उदीरणा है।' उपशामना-उपशामना दो प्रकार की है- प्रशस्तोपशामना और अप्रशस्तोपशामना अध:करण अपूर्वकरण व अनिवृत्तिकरणों के द्वारा जो मोहनीयकर्म की उपशामना होती है वह प्रशस्तोपशामना है। बन्ध के समय सभी कर्मों के कुछ प्रदेशों में अप्रशस्तोपशामना होती है, यहाँ पर उसका प्रकरण है। "कमपरमाणूणं बज्झंतरंगकारणवसेण केत्तियाणं पि उदीरणावसेण उदयाणागमपइण्णा अप्यसत्थउवसामणा ति भण्णदे"अर्थात् कितने ही कर्म परमाणुओं का बहिरंग-अन्तरंग कारणवश उदीरणा द्वारा उदय में अनागमन रूप प्रतिज्ञा को अप्रशस्तोपशामना कहते हैं। "अप्पसत्थुवसामणाए जमुवसंतं पदेसग्गं तमोकड्डिहुँ पि सक्वं, उक्कड्डिदु पि सर्क, पयडीए संकामिदुं पि सक्कं उदयावलियं पवेसि, ण उ सक।" अर्थात् अप्रशस्तोपशामना के द्वारा जो प्रदेशाग्र उपशान्त होता है वह अपकर्षण के लिए भी शक्य है, उत्कर्षण के लिए भी शक्य है तथा अन्य प्रकृति में संक्रमण कराने के लिए भी शक्य है। वह केवल उदयावली में प्रविष्ट कराने के लिए शक्य नहीं है।' “जं कम्ममोकडुक्कड्डणपरपयडिसंकमाणं पाओग्गं होदूण पुणो णो सक्कमुदष्टिदिमोकाडतुं उदीरणाविरुद्धसहावेण परिणदत्तादो तं तहाविहपइण्णाए पडिगहियमप्पसत्थ उवसामणाए उवसंतमिदि भण्णदे। तस्स सो पज्जाओ अप्पसत्थउवसामणाकरण णाम । अर्थात् जो कर्म अपकर्षण, उत्कर्षण और परप्रकृतिसंक्रम के योग्य होकर पुनः उदीरणा के विरुद्ध स्वभाव रूप से भारत होने के कारण दपस्थिति में अपकर्षित होने के अयोग्य है वह उस प्रकार से स्वीकार की गई अप्रशस्तोपशामना की अपेक्षा उपशांत ऐसा कहलाता है। उसकी उस पर्याय का नाम उपशामनाकरण है।' निधत्ति- "जं पदेसग ण सक्कमुदए दादं अण्णपयडि वा संकामेदं तं णिधत्तं णाम।" अर्थात् जो कर्म प्रदेशाग्र उदय में देने के लिए अथवा अन्य प्रकृति रूप परिणमाने के लिए शक्य नहीं वह निधत्त है।" "जं कम्ममोकइडुक्कडणासु अविरुद्धसंचरणं होटूण पुणो उदयपरपयडिसंकमाणमणागमणपइण्णाए पडिग्गहियं तस्स सो अवस्थाविसेसो णिधत्तीकरणमिदि भण्णदे।' अर्थात् जो कर्म अपकर्षण और उत्कर्षण के अविरुद्धपर्याय के योग्य होकर पुनः उदय और परप्रकृतिसंक्रमरूप न हो सकने की प्रतिज्ञा रूप से स्वीकृत उसकी उस अवस्था विशेष को निधत्तीकरण कहते हैं।६ "ज पदेसम्गं णिवत्तीकयं उदए दाईं णो सनं, अण्णपयडिं संकामिदं पि णो सर्क, ओकड्डिदुमुकड्डिदुंच सकएवं विहस्स पदेसग्गस्स णिधत्तमिदि सण्णा।" अर्थात् जो कर्मप्रदेशाग्र निधत्तीकृत है यानी उदय में देने के लिए शक्य नहीं है, अन्य प्रकृति में संक्रांत करने के लिए भी शक्य ५. प्रा. पंचसंग्रह पृ. ६७६ भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन। ३. जयधवल पु. १३१.२३१। ५.ध.पु.११.२३५। २. बाल पु. १५ पृ. २७६ । ४. जयधवल पु. १६ १. २३५ ।। ६. जयधयान पू. १३ पृ. २३१ ।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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