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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३९९ तथा अवशेष ५ निद्रा, २ वेदनीय, २५ मोहनीय, तिर्यञ्चायु, मनुष्यायु, तिर्यञ्च-मनुष्यगति, ५ जाति, औदारिकशरीर-औदारिकअङ्गोपाङ्ग, ६ संहनन, ६ संस्थान, तिर्यञ्च-मनुष्यगत्यानुपूर्वी, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास, प्रशस्त-अप्रशस्तविहायोगति, बस-स्थाबर, बादर-सूक्ष्म, पर्याप्त-अपर्याप्त , प्रत्येक-साधारण, सुभग-दुर्भग, सुस्वर-दुःस्वर, आदेय-अनादेय, यशस्कीर्ति-अयशस्कीर्ति, उच्चनीचगोत्र ये ८२ प्रकृतियाँ स्वपरोदयबंधी हैं अर्थात् स्वयं के उदय में अथवा पर प्रकृति के उदय में इनका बन्ध होता है। अब पूर्वोक्त ९ प्रश्नों में से अन्तिम तीन प्रश्नों का उत्तर ४ गाथाओं से देते हैं सत्तेताल धुवावि य, तित्थाहाराउगा णिरंतरगा। णिरयदुजाइचउक्वं, संहदिसंठाणपणपणगं ।।४०४ ।। दुग्गमणादावदुर्ग, थावरदसगं असादसंदित्थि। अरदीसोगं चेदे, सांतरगा होंति चोत्तीसा ॥४०५॥जुम्मं॥ अर्थ- ज्ञानावरणादि ४७ ध्रुवबन्धी प्रकृतियाँ, तीर्थङ्कर, आहारकद्विक, आयु ४ ये ५४ प्रकृतियाँ निरन्तर बँधने वाली हैं और नरकद्विक, एकन्द्रियाद चार जाति, प्रथम सहमन बना ५ सहनन, प्रथम संस्थान बिना ५ संस्थान, अप्रशस्तविहायोगति, आतप, उद्योत, स्थावर आदि १०, असातावेदनीय, नपुंसकवेद, स्त्रीवेद, अरति और शोक ये ३४ प्रकृतियाँ सान्तरबन्धी हैं। एक समय से लेकर अन्तर्मुहूर्त से कम काल पर्यन्त जिनका बन्ध होता है, वे सान्तर प्रकृतियाँ हैं। विशेषार्थ-पाँचज्ञानावरण, नौदर्शनावरण, पाँचअन्तराय, मिथ्यात्व, १६ कषाय, भय-जुगुप्सा, तैजस-कार्मण, अगुरुलघु, उपधात, निर्माण, वर्णादिचतुष्क इन ४७ प्रकृतियों का अपनी-अपनी व्युच्छित्तिपर्यन्त सदा बंध पाया जाता है अत: ये ध्रुवबन्धी हैं। तीर्थङ्कर, आहारकशरीर-आहारकअङ्गोपाङ्ग, चार आयु ये ७ प्रकृति उपर्युक्त ४७ प्रकृतियों में मिलकर ५४ प्रकृतियाँ निरन्तरबन्धी हैं। इनमें से ४७ प्रकृतियों का तो व्युच्छित्ति से पूर्व समय तक निरन्तर बन्ध पाया जाता है और आहारकद्विक और तीर्थङ्कर प्रकृति का बन्ध प्रारम्भ होने के पश्चात् जिन गुणस्थानों में इनका बन्ध पाया जाता है वहां निरन्तर प्रति समय अन्तर्मुहूर्त से अधिककाल पर्यन्त बन्ध पाया जाता है। आयु का जिसकाल में बन्ध होना योग्य है उस समय से अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त निरन्तर बन्ध होता है इसलिए इसको निरन्तरबन्धी कहते हैं। नरकगति-नरकगत्यानुपूर्वो, एकेन्द्रियादि चार जाति वर्षभनाराच बिना पाँचसंहनन, समचतुरसबिना पांच संस्थान, अप्रशस्तविहायोगति, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण, अस्थिर, १. धवल पु. ८ पृ. १७१ २. धवल पु.८ पृ.१६।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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